दिल्ली। ओशो की रहस्यमयी परिस्थितियों में हुई मृत्यु के 23 वर्ष बाद उनकी एक ‘वसीयत’ सामने आई है। इसको लेकर उनके अनुयायियों के दो प्रतिद्वंद्वी गुटों के बीच उनकी संपत्ति और उनके विचारों के अधिकार को लेकर चल रहे विवाद ने एक नया मोड़ ले लिया है।

आध्‍यात्मिक गुरु ओशो रजनीश का देहांत 19 जनवरी 1990 को पुणे में हो गया था। उनकी मृत्यु के बाद ओशो संन्यासियों द्वारा आयोजित एक संवादताता सम्मेलन में बताया गया था कि ओशो ने उनके उत्तराधिकारी का कोई जिक्र नहीं किया है।

हालांकि ओशो के समर्थकों के एक वर्ग का मानना है कि ये वसीयत पूरी तरह से जाली दस्तावेज है क्योंकि ओशो की मृत्यु के बाद उनकी वसीयत का कोई उल्लेख नहीं हुआ था। ये वसीयत 16 जून 1989 को स्टांप पेपर पर तैयार की गई थी जिसमें ओशो का मूल नाम चंद्रमोहन जैन और उनके हस्ताक्षर हैं।
‘वसीयत’ अनुसार विदेशी हाथों में चले जाएंगे ओशो के प्रवचन और पुणे की प्राइम लोकेशन पर मौजूद उनका आश्रम। इस कागजात को ओशो की आखिरी वसीयत कहा जा रहा है और इसने ओशो के साम्राज्य को लेकर चल रही मालिकाना हक की लड़ाई को नया मोड़ दे दिया है। ओशो के साम्राज्य में उनका पुणे की प्राइम लोकेशन पर 10 एकड़ में फैला विशाल आश्रम और उनके प्रवचनों के प्रकाशन से हो रही करोड़ों की आय शामिल है।
ये वसीयत ओशो की संपत्ति और प्रकाशन के सारे अधिकार ‘नियो संन्यास इंटरनेशनल’ को ट्रांसफर करती है। ये संस्था वर्तमान में ‘ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन’ के नाम से भी जानी जाती है जो कि स्विस बेस्ड ट्रस्ट है। इसे ओशो के पुराने समर्थक माइकल ओ ब्रायन संचालित करते हैं।

ओशो की मृत्यु के बाद ओशो आश्रम को यही ट्रस्ट चलाता है। ये वसीयत ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन ने ही स्पेन में ट्रेडमार्क के विवाद के चलते पेश की जबकि ओशो फ्रेंड्स फाउंडेशन नाम के एक समूह ने पुणे में इसे व्यर्थ घोषित कर निरस्त करने की मांग को लेकर जनहित याचिका दायर की हुई है।

16 जून 1989 को ओशो की हस्ता‍क्षरित वसीयत में सभी संपत्ति, उनके नाम और प्रकाशन का स्वामित्व और अधिकार एक स्विस धर्मार्थ ट्रस्ट के लिए नियो संन्यासी इंटरनेशनल फाउंडेशन के पास सुरक्षित है। 10 रुपए के स्टाम्प पर हस्ताक्षरित इस वसीयत के मालिक माइकल ओ’बायर्न (उर्फ स्वामी जयेश) हैं, जो वर्तमान में ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन के अध्यक्ष हैं। गवाहों के रूप में जॉन एंड्रयूज (उर्फ स्वामी अमृतो) फिलिप टोयक्स (उर्फ स्वामी प्रेम निरेन) हैं।

ओशो की वसीयत कहे जा रहे कागजात के एक टुकड़े में में लिखा है, ‘मैं, ओशो, जन्म का नाम चंद्रमोहन जैन, आमतौर पर भगवान श्रीरजनीश के नाम से जाना जाता हूं और अपनी पूरी संपत्ति व सारे प्रकाशन अधिकार नियो संन्यास इंटरनेशनल फाउंडेशन को दान करता हूं।’ हालांकि इस कागज पर भरोसा किया जाना मुश्किल है।

ओशो मित्र फाउंडेशन के योगेश ठक्कर उर्फ स्वामी प्रेमगीत और किशोर रावल उर्फ स्वामी प्रेम अनाड़ी ने इस वसीयतनामे को एक याचिका दायर कर चुनौती दी है। उन्होंने इसमें माइकल ओ’बायर्न, जॉन एंड्रयूज और फिलिप द्वारा प्रस्तुत इन दस्तावेजों को अमान्य घोषित करने की मांग की।

उन्होंने ओशो की अचल और चल संपत्तियों और ओशो की बौद्धिक संपदा को सुरक्षित रखने के लिए अदालत से स्थायी रूप से एक प्रशासनिक अधिकारी की नियुक्ति की मांग की है।

Firstpost.com से बात करते हुए ठक्कर ने कहा कि यदि इस वसीयत की प्रामाणिकता को चुनौती नहीं दिए जाने की अनुमति दी जाती है तो इसका मतलब यह होगा कि ओशो से संबंधित बौद्धिक अधिकार को भारत से बाहर ले जाना।

ठक्कर और उनके सहयोगी याचिकाकर्ताओं के पहले ही दो केस मुंबई हाई कोर्ट में लंबित हैं जिसमें नियो संन्यासी फाउंडेशन के प्रशासक, एका रजनी‍श फाउंडेशन और ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन के खिलाफ 300 करोड़ रुपए के हेरफेर के मामले दर्ज हैं।

ये है ओशो की विरासत : याचिकाकर्ता के अनुसार ओशो अपने पीछे हिंदी और अंग्रेजी में दिए 9000 घंटे के प्रवचन छोड़ कर गए है जो आडियो और वीडियों के रूप में संग्रहित है, जिसमें 1870 घंटे के वीडियो प्रवचन है। हिंदी और अंग्रेजी की मिलाकर 650 बुक है जिनका दुनिया की 65 भाषाओं में अनुवा‍द हो चुका है। ओशो द्वारा बनाई गई 800 पेंटिंग है। उनकी पर्सनल लाइब्रेरी में 80 हजार किताबें है जो पुणे के कोरेंगांव कम्युन में सुरक्षित रखी है। इसके अलावा पुणे स्थित ओशो इंटरनेशनल फाउंडेशन की कोरेगांव पार्क इलाके की करीब एक हजार करोड़ की 35 एकड़ जमीन।

आरोप है कि ओशो रजनीश के अमेरिका स्थित ऑरेगान कम्यून को षड़यंत्र के तहत नष्ट कर देने के बाद पुणे के कम्यून को नष्ट करने की साजिश चल रही है। जिन लोगों ने ओशो रजनीश के जाने के बाद जबरन पुणे के कोरेगांव कम्यून पर कब्जा कर लिया था वे ही लोग अब यहां की सारी संपत्तियों को प्राइवेट कंपनियों के हाथों सौंपकर विदेश भागने की तैयारी कर रहे हैं।

जिन लोगों का पुणे के कम्यून पर अधिकार है जरा उनके नाम भी जान लें- कनाडा मूल के स्वामी जयेश (माइकल ओबिरीन), स्वामी योगेन्द्र (डार्सी ओबिरिन) एवं इंग्लैण्ड से आए स्वामी अमृतो (जार्ज मेरेडिथ)।

आश्रम के लोग इनको आश्रम का तानाशाह मानते हैं। इन्होंने भारतीयों को लगभग हाशिये पर धकेल दिया है। इनकी नितियों और कार्यों के चलते ही आश्रम में दो फाड़ हो गए। इन तीनों न्यासियों के मनमानी के तौर-तरीके और ओशो के विचारों और संपत्तियों के साथ हेरा-फेरी और छेड़खानी करने के आरोप लगते रहे हैं।
इन्होंने ही प्लानिंग के तहत सबसे पहले ओशो कम्यून की सभी जगह से ओशों के चित्र हटा दिए। फिर उसकी प्रतिक्रिया जानने के बाद कुछ दिनों बाद ओशो कम्यून आश्रम को रिसोर्ट में बदल दिया। उसे उन्होंने नाम दिया ‘ओशो इंटरनेशनल मेडिटेशन रिसोर्ट’। आश्रम जाने पर अब नहीं लगता है कि वह ओशो का आश्रम है।

रजनीश आश्रम के कुछ प्रमुख कर्ता-धर्ता आश्रम से संबद्ध सारी बातों में बदलाव कर रहे हैं, लेकिन भारतीय संन्यासी इस बदलाव के पक्ष में नहीं है। आश्रम के पूर्व प्रवक्ता तथा आचार्य रजनीश के निकटतम शिष्यों में से एक चैतन्य कीर्ति इन परिवर्तनों का विरोध करते रहे हैं। विरोध के बावजूद कुछ चुनिंदा लोगों की मनमानी जारी है। मनमानी करने वालों में मुख्य रूप से विदेश से आए शिष्य हैं।
सवाल उठता है कि क्या अब इन विदेशियों में अपने क्रिश्चियन भाव जाग्रत हो गए हैं या कि किसी अंतरराष्ट्रीय साजिश के तहत ऐसा किया जा रहा है? जैसे कि पूर्व में पहले भी अमेरिकी और कट्टर ईसाई राष्ट्र करते रहे हैं।

इन न्यासियों द्वारा ‘रजनीश आश्रम’ के कारोबार एवं चंदे की राशि में भी हेराफेरी करने की चर्चा इन दिनों जोरों पर है। इन न्यासियों पर आरोप है कि उन्होंने रजनीश आश्रम की राशि अपने निजी खातों में जमा कराई है।

स्वामी जयेश, स्वामी योगेन्द्र तथा स्वामी अमृतो ने ओशो आश्रम के तहत ओशो मल्टीमीडिया एण्ड रिसोर्टस् प्रा. लिमिटेड नामक निजी कंपनी का गठन कर घोटाला किया है। ओशो के नाम से निजी कंपनी का गठन व संचालन करने के कारण मूल ‘ओशो न्यास’ को मिलने वाले लाभ अब कम हो गए हैं। इस कारण आश्रम को आर्थिक तौर पर नुकसान उठाना पड़ रहा है और आश्रम से संबद्ध सभी लोगों में असंतोष है। दूसरी ओर ओशो मल्टीमीडिया एण्ड रिसोर्ट की पूंजी तथा मुनाफे में बढ़ोतरी हो रही है।
इन सारी अनियमितताओं के कारण आचार्य रजनीश के आश्रम में आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या में भी अत्याधिक कमी आई है। आश्रम से जुड़े सूत्रों के अनुसार पहले रजनीश आश्रम में आने वाले दर्शनार्थियों की संख्या प्रतिदिन 1200 से 1500 हुआ करती थी, वह अब मात्र 150 के आसपास तक ही सीमित हो गई।

उक्त संन्यासियों पर आरोप हैं कि यह धीरे-धीरे ओशो के आडीयो, वीडियो और किताबों के अधिकार प्राप्त कर ओशो के विचारों को फैलने से रोकेंगे और अंतत: ओशो लुप्त हो जाएंगे। ओशो का लुप्त हो जाना ही ईसाई विचारधारा के हित में हैं।