भीड़

मैं दुनिया में किसी तरह की भीड़ नहीं चाहता। वह चाहे धर्म के नाम पर इकट्ठी हुई हो, या देश के नाम पर, या वर्ग के नाम पर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। भीड़ उस रूप में एक कुरूप चीज है, और भीड़ ने दुनिया में बहुत बड़े-बड़े अपराध किए हैं, क्योंकि दुनिया में चेतना नहीं है। यह एक सामूहिक बेहोशी है।
चेतना तुम्हें निजता देती है–एकांत में देवदार वृक्ष का हवा के साथ नाचना, एकांत में बर्फ से ढंके पहाड़ के ऊंचे शिखर पर चमकता सूरज अपने पूर्ण वैभव और सुंदरता के साथ, अकेला सिंह और उसकी काफी सुंदर दहाड़ जो घाटियों में मीलों तक गूंजती चली जाती है।