अपनी आवाज पुन: पहचानें

 ‘यदि तुम अपने झुकाव के अनुसार चुनते हो, अपने अंतर्ज्ञान के अनुसार…(आंतरिक आवाज)बच्चों में बहुत तीब’ होती है परंतु वह धीरे-धीरे कमजोर होती जाती है। मां-बाप की, शिक्षकों की, समाज की और पुरोहितों की आवाजें क’मश: तेज होती जाती हैं। अब यदि तुम अपनी आवाज खोजना चाहते हो, तो तुम्हें आवाजों की एक भीड़ से गुजरना होगा।

‘बस भीतर देखो: यह किसकी आवाज है? कभी यह तुम्हारे पिता की, कभी यह तुम्हारे मां की, कभी यह तुम्हारे शिक्षक की; और वे सभी आवाजें भिन्न हैं। बस एक चीज जो तुम आसानी से नहीं पा सकोगे — वह है तुम्हारी खुद की आवाज। उसे सदा से दबाया गया है। तुम्हें हमेशा कहा गया है कि अपने बड़ों की सुनो, अपने धर्म-गुरूओं की सुनो, अपने शिक्षकों की सुनो। तुम्हें स्वयं अपने हृदय की सुनने के लिए कभी नहीं कहा गया है।

‘ तुम एक मद्धिम सी, छोटी सी अपनी स्वयं की आवाज लिए हुए हो, अनसुनी, और आवाजों की इस भीड़ में जो तुम्हारे ऊपर आरोपित की गईं हैं, उसे पाना लगभग असंभव सा है। पहले तुम्हें उन आवाजों से किनारा करना होगा, एक विशेष प्रकार का मौन, शांति और पवित्रता पानी होगी। केवल तभी यह आती है, एक आश्चर्य की तरह, कि तुम्हारी भी अपनी स्वयं की एक आवाज है। यह हमेशा से एक भीतरी छुपी हुई विद्युत धारा की तरह है।

‘जब तक तुम अपनी स्वाभाविक प्रवृत्ति नहीं पा लेते, तुम्हारा जीवन, जन्म से लेकर मृत्यु तक एक लम्बी त्रासदी है। संसार में केवल वे ही लोग आनंदपूर्ण हैं, जो अपने अंतर्ज्ञान के अनुसार जीते हैं और दूसरों द्वारा उनके विचार थोपने के किसी प्रयास के विरूद्ध विद्रोह करते हैं। चाहे वे विचार कितने भी महत्वपूर्ण हों, वे निरर्थक हैं क्योंकि वे तुम्हारे नहीं हैं। महत्वपूर्ण विचार केवल वह है जो तुममें पैदा होता है, तुम्हारे भीतर विकसित होता है और तुम्हारे भीतर ही पुष्पित होता है।’

चरण 1: कौन बोल रहा है, प्लीज? 
‘तुम जो भी कर रहे हो, सोच रहे हो,निर्णय कर रहे हो, स्वयं से पूछो: क्या यह मेरे भीतर से आ रहा है या कोई दूसरा बोल रहा है?’

‘तुम आश्चर्यचकित हो जाओगे जब तुम अपनी वास्तविक आवाज पाओगे। शायद यह तुम्हारी मां है; तुम उन्हें बोलते हुए फिर सुनोगे। शायद यह तुम्हारे पिता हैं; यह पता लगाना बहुत कठिन नहीं है। यह तुम्हारे भीतर रिकार्डेड पड़ा रहता है जैसा यह पहली बार तुम्हें दिया गया था — सलाह, आज्ञा, अनुशासन या ईश्वर की आज्ञा के रूप में। तुम तमाम लोगों को पाओगे: धर्म-गुरूओं, शिक्षकों, मित्रों, पड़ोसियों और रिश्तेदारों को।’

‘इन सबसे लड़ने की कोई आवश्यकता नहीं है। केवल यह जानना पर्याप्त है कि यह तुम्हारी आवाज नहीं है, बल्कि  यह किसी और की है — यह कोई दूसरा कोई भी हो — तुम जानते हो कि तुम उसका अनुसरण नहीं करने जा रहे हो। जो भी परिणाम हो — अच्छा या बुरा — अब तुम अपने अनुसार चलने का निर्णय लेते हो, तुम प्रौढ़ होने का निर्णय लेते हो। तुम बहुत बचकाना रह चुके। तुम दूसरे पर बहुत आश्रित रह चुके। तुमने यह सब आवाजें बहुत सुनीं और उनका बहुत अनुसरण कर चुके। और यह सब तुम्हें कहां ले आईं? केवल एक उलझाव में।

चरण 2: धन्यबाद… और गुडबाय! 
‘एक बार तुमने पहचान लिया कि यह किसकी आवाज है, उस व्यक्ति को धन्यवाद दो, तुम्हें अकेला छोड़ देने को कहो और गुडबाय कहो।’

‘जिस व्यक्ति ने तुम्हें वह आवाज दी थी, तुम्हारा दुश्मन नहीं था। उसकी नीयत बुरी नहीं थी। प्रश्न केवल यह था कि उसने तुम पर कुछ थोपना चाहा था जो तुम्हारे आंतरिक स्रोत से नहीं आ रहा था; और कुछ भी जो बाहर से आता है, तुम्हें मनोवैज्ञानिक गुलाम बनाता है।’

‘एक बार तुमने जब किसी आवाज को साफ-साफ कह दिया, ‘मुझे अकेला छोड़ दो,’ उससे तुम्हारा संबंध, उससे तुम्हारा तादात्म टूट जाता है। यह तुम्हें नियंत्रित करने में सक्षम थी क्योंकि तुम सोच रहे थे कि यह तुम्हारी आवाज है। पूरी रणनीति केवल तादात्म की थी। अब तुम जानते हो कि यह तुम्हारे विचार नहीं हैं, यह तुम्हारी आवाज नहीं है; यह तुम्हारे स्वभाव के लिए कुछ बाहरी है। इसे पहचान लेना पर्याप्त है। जो आवाजें तुम्हारे भीतर हैं, उनसे छुटकारा पाना है और जल्दी ही तुम एक मंद,स्थिर आवाज सुनकर आश्वर्यचकित हो जाओगे, जो तुमने पहले कभी नहीं सुना था… और तब अचानक पाते हो कि यह तुम्हारी आवाज है।

‘यह सदा से थी, परंतु यह बहुत धीमी, मंद आवाज थी, क्योंकि जब तुम बहुत छोटे बच्चे थे तभी से यह दबा दी गई थी, और आवाज बहुत छोटी थी, बस अंकुरित हो रही थी, और उसे सब तरह के कचरे से ढक दिया गया। और अब तुम वह सारा कचरा ढोए जा रहे हो और उस पौधे को भूल गए हो जो तुम्हारा जीवन है, जो अब भी जीवित है, तुम्हारे इंतजार में कि तुम उसे फिर आविष्कृत करोगे। आवाज आविष्कृत करो और फिर बिना भय के उसका अनुगमन करो।’

‘जब भी यह नेतृत्व करती है, वह तुम्हारे जीवन का लक्ष्य होता है, वह तुम्हारी नियति होती है। केवल वहीं तुम्हें तृप्ति और संतुष्टि मिलेगी। केवल वहीं तुम्हारा फूल खिलेगा — और उस खिलने में, जानना घटित होता है।’

ओशो: फ्राम इग्नोरेंस टु इनोसेंस प्र 13