मेरे पास न मालूम कितने लोग आते हैं। वे कहते हैं, शांत कैसे हों?
मैं उनसे पूछता हूं कि पहले तुम मुझे बताओ कि तुम अशांत कैसे हुए? क्योंकि जब तक यह पता न चल जाए कि तुम कैसे अशांत हुए, तो शांत कैसे हो सकोगे!
एक आदमी मेरे पास लाया गया। उसने कहा, मैं अरविंद आश्रम से आता हूं। शिवानंद के आश्रम गया हूं। महेश योगी के पास गया हूं। ऋषिकेश हो आया। यहां गया, वहां गया। रमण के आश्रम गया हूं। कहीं शांति नहीं मिलती। तो किसी ने आपका मुझे नाम दिया तो मैं आपके पास आया हूं।

तो मैंने कहा, इसके पहले कि तुम निराश होकर लौट जाओ, तुम लौट जाओ पहले ही। नहीं तो तुम और लोगों से भी जाकर कहोगे कि वहां भी गया और शांति नहीं मिली। तो तुम अभी ही लौट जाओ, इसके आगे बात करनी उचित नहीं है।

उसने कहा, क्या मतलब आपका? मैं तो बड़ी आशा से आया हूं।

तो मैंने उस आदमी को कहा कि अशांति सीखने तुम किस आश्रम में गए थे? किस गुरु से अशांति सीखी? अशांति तुम सीखोगे और शांति मैं न दे पाऊंगा तो अपराधी मैं हो जाऊंगा। मैंने उस आदमी से पूछा, तुम फिकर छोड़ो शांति की, तुम मुझे यह बताओ कि तुम अशांत कैसे हुए? क्योंकि जो अशांत होने का ढंग है उसी में कुंजी छिपी है शांत होने की, और कहीं कोई शांति नहीं खोज सकता।

अशांत होते हैं हम, जिंदगी के साथ जोर से चिपक जाते हैं इसलिए अशांत होते हैं। जिंदगी को बहने नहीं देते, तिनके की तरह आड़े लड़ते हैं जिंदगी से, तो अशांत होते हैं। उस तिनके की तरह सीधे नहीं नदी में बह जाते। नहीं तो फिर अशांति का कोई कारण नहीं है। अशांत हम होते हैं, हमारा जीवन के प्रति जो ढंग है, उससे। वह जो हमारा वे ऑफ लिविंग है, उससे हम अशांत होते हैं। और शांति हम खोजते हैं कि किसी मंत्र से मिल जाए, किसी माला से मिल जाए। शांति हम खोजते हैं कि किसी के आशीर्वाद से मिल जाए। शांति हम खोजते हैं कि परमात्मा की कृपा से मिल जाए। हम अशांत होने का पूरा इंतजाम करते चले जाते हैं और शांति खोजते रहते हैं। तब यह शांति की खोज सिर्फ एक और नई अशांति बन जाती है, और कुछ भी नहीं होता।

इसलिए साधारण आदमी साधारण रूप से अशांत होता है, धार्मिक आदमी असाधारण रूप से अशांत हो जाता है। क्योंकि वह कहता है, शांति भी चाहिए। और वह जो चाहिए था सब, वह तो चाहिए ही—वह धन भी चाहिए, वह यश भी चाहिए, वह पद भी चाहिए—वह सब तो चाहिए ही, शांति भी चाहिए। उसकी फेहरिस्त में एक आयटम चाह का और बढ़ गया—शांति भी चाहिए। आगे लिखेगा: परमात्मा भी चाहिए। और उसकी अशांति और बढ़ जाएगी। इसलिए किसी घर में एक आदमी तथाकथित धार्मिक हो जाए, तो खुद तो अशांत होता है, बाकी लोगों को भी शांत रहने देने में दिक्कत डालने लगता है। सबको गड़बड़ कर देता है। शांति चाहिए, यह भी उसके लिए अशांति ही बन जाती है।

शांति चाही नहीं जा सकती, सिर्फ अशांति समझी जा सकती है। शांति को चाहा ही नहीं जा सकता, क्योंकि चाह अशांति है। इसलिए शांति को कैसे चाहिएगा? वह तो कंट्राडिक्ट्री हो जाएगी। शांति को कोई नहीं चाह सकता। शांति को डिजायर ऑब्जेक्ट नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि सब इच्छाएं अशांति पैदा करती हैं, इसलिए शांति इच्छा नहीं बन सकती। सिर्फ अशांति को कोई समझ ले और अशांत न हो, तो जो शेष रह जाता है उसका नाम शांति है। शांति एब्सेंस है। शांति सिर्फ अभाव है।

स्वास्थ्य क्या है? अगर किसी डाक्टर से पूछें जाकर—स्वास्थ्य क्या है? तो वह कहेगा—बीमारियों का अभाव। इसलिए अगर किसी डाक्टर से कहें कि मुझे स्वास्थ्य का इंजेक्शन लगा दें! तो वह कहेगा, क्षमा करें मुझे। हम बीमारी काटने का इंजेक्शन लगा सकते हैं, स्वास्थ्य का कोई इंजेक्शन नहीं है। डाक्टर से आप कहें कि हमें स्वास्थ्य दे दीजिए! तो वह कहेगा, हम बीमारी छीन सकते हैं, स्वास्थ्य कैसे दे देंगे? हां, बीमारी नहीं बचेगी तो जो बच रहेगा वह स्वास्थ्य है।

इसलिए किसी मेडिकल साइंस की किसी किताब में—चाहे आयुर्वेद हो, और चाहे एलोपैथी हो, और चाहे होमियोपैथी हो—स्वास्थ्य की कोई परिभाषा नहीं है, कोई डेफिनीशन नहीं है कि स्वास्थ्य क्या है। सिर्फ बीमारियों की परिभाषाएं हैं कि बीमारी क्या है। और जहां बीमारी नहीं होती, वहां जो शेष रह जाता है, वह स्वास्थ्य है। इसलिए स्वास्थ्य की सब परिभाषाएं निगेटिव हैं, सब नकारात्मक हैं। बीमारी जहां नहीं है, वहां स्वास्थ्य है। अशांति के कारण जहां नहीं हैं, वहां शांति है।

और ध्यान रहे, अगर आप सोचते हों कि परमात्मा हमें शांति दे दे, तो आप बड़ी गलती में पड़ेंगे। परमात्मा से आपका संबंध ही तब होगा जब आप शांत होंगे। इसलिए परमात्मा कोई शांति नहीं दे सकता। अगर आप सोचते हों कि परमात्मा हमें शांति दे दे, तो आप बड़ी गलत कंडीशन लगा रहे हैं। परमात्मा से संबंध ही तब होता है जब आप शांत हों। और जिससे संबंध ही नहीं है, उसकी तरफ की गई प्रार्थना अंधेरे में फिंक जाती है, कहीं नहीं पहुंचती। जिससे संबंध नहीं, कम्युनिकेशन नहीं, उसके साथ प्रार्थना का संबंध नहीं बन पाता। शांत आदमी ही प्रार्थना कर सकता है।

लेकिन अब तक अशांत आदमी प्रार्थना करता रहता है। और अशांत आदमी सोचता है—हमारी प्रार्थना सुनी नहीं जा रही। वह ऐसा ही है कि टेलीफोन बिना उठाए आदमी बोले चला जा रहा है और सोचता है—दूसरी तरफ कोई सुन नहीं रहा!

मैंने सुना है कि एक आदमी ने अपने घर की कॉलबेल सुधरवाने के लिए एक मेकेनिक को बुलाया हुआ था। बाहर जो घंटी लगी है घर के भीतर बुलाने की। दो दिन बीत गए, तीन दिन बीत गए, वह मेकेनिक नहीं आया। तो उसने फिर उसे फोन किया कि तुम आए नहीं, मैं तीन दिन से रास्ता देख रहा हूं।

उसने कहा, मैं आया था, मैंने कॉलबेल बजाई थी, लेकिन किसी ने दरवाजा नहीं खोला। अब उसको कॉलबेल सुधरवाने के लिए बुलाया हुआ था। वह सज्जन ने कॉलबेल बजाई, किसी ने नहीं सुनी इसलिए वापस लौट गए।
अधिक लोगों की प्रार्थनाएं इसी तरह की कॉलबेल पर हाथ रखना है, जो बिगड़ी पड़ी है, जो कहीं नहीं बजेगी। वे जिंदगी भर प्रार्थना करते रहें, कहीं नहीं सुनी जाएगी। फिर नाराज परमात्मा पर होंगे आप।
नाराज अपने पर हों, परमात्मा का इसमें कोई कसूर नहीं है। परमात्मा के साथ कम्युनिकेशन का, संवाद का जो पहला सूत्र है, वह शांति है। शांति के ही द्वार से हम उससे संबंधित होते हैं। या इससे उलटा कहें तो ज्यादा अच्छा होगा। अशांति के कारण हम उससे डिसकनेक्ट हो जाते हैं, अशांति के कारण हम असंबंधित हो जाते हैं। शांति के कारण हम संबंधित हो जाते हैं। शांति संबंध है, अशांति असंबंध है। बीच का तार कट गया, टूट गया।

इसलिए परमात्मा से शांति मत मांगना, शांति आप लेकर जाना उसके द्वार पर। आनंद उससे मिल सकता है, शांति आपको बनानी पड़ेगी।
इसे थोड़ा समझ लेना उचित होगा। शांति हमारी पात्रता है, आनंद उसका प्रसाद है। शांत हमें होना होगा, आनंद से वह हमें भर देगा। शांति हमारी पात्रता है, आनंद उसकी वर्षा है। तो आनंद तो प्रसाद है। आप आनंदित नहीं हो सकते, आप सिर्फ शांत हो सकते हैं। आनंद बरसेगा। ऐसा समझें, शांति हमारा पात्र है और आनंद उसकी नदी है, जिससे हम अपने पात्र में पानी को भर लाते हैं।

लेकिन आप बिना ही पात्र के नदी के पास चले गए हैं और चिल्ला रहे हैं, और नदी से ही कह रहे हैं कि पात्र दे दे!
नदी पानी दे सकती है, पात्र आपके पास होना चाहिए। परमात्मा से लोग पात्र मांग रहे हैं। पात्र तो आपको होना पड़ेगा।

ओशो: धर्म साधना, #8

शांति पाने की कोशिश मत करे,अशांति को स्वीकार कर ले-आप शांत हो जायेंगे। फिर दुनिया में कोई आपको अशांत नही कर सकता। अगर मैं अशांति के लिए राज़ी हू ,कौन मुझे अशांत कर सकता है?अगर मैं गाली के लिए तैयार हू तो कौन मेरा अपमान कर सकता है?मैं गाली के लिए राज़ी नही हू इसलिए कोई मेरा अपमान कर सकता है। मैं अशांति के लिए राज़ी नही हू इसलिए कोई भी अशांत कर सकता है।

अगर हम ठीक से मन की प्रक्रिया को समझ ले,तो मन की प्रक्रिया को समझकर जीवन बदल जाता है। प्रक्रिया ये है की मन हमेसा चीजों को दो में तोड़ देता है-मान-अपमान,सुख-दुःख,शांति-अशांति,संसार-मोक्ष। और कहता है एक नही चाहिए,अरुचिकर है,और एक चाहिए रुचिकर है-बस ये मन का खेल है।

इस मन से बचने के दो उपाय है-या तो दोनों के लिए राज़ी हो जाये-मन मर जायेगा। या दोनों को छोड़ दे,मन मर जायेगा। जो आपके लिए अनुकूल पड़े वैसा कर ले-अन्यथा आपके शांत होने का कोई उपाय नही है।

जब तक आप शांत होना चाहते है,तब तक शांत न हो सकेंगे। जब तक सुखी होना चाहते है दुःख आपका भाग्य होगा, और जब तक मोक्ष के लिए पागल है,संसार आपकी परिक्रमा होगी। दोनों के लिए राज़ी हो जाये-मांग ही छोड़ दे,-कह दे जो होता है मैं राज़ी हू’।
इसका थोडा प्रयोग करके देखे-24 घंटे,ज्यादा नही। लड़ने का प्रयोग तो आप जन्मो से कर रहे है,एक 24 घंटे तय कर ले, की आज सुबह 6 बजे से कल सुबह 6 बजे तक जो भी होगा,उसको मैं स्वीकार कर लूँगा,जहाँ भी हो विरोध,द्वन्द नही खड़ा करूंगा।

करके देखे,24 घंटे में आपकी जिंदगी में एक नई हवा का प्रवेश होगा। जैसे कोई झरोखा अचानक खुल गया,और ताज़ी हवा आपकी जिन्दगी में आनी शुरू हो गई। फिर ये 24 घंटे कभी खत्म न होंगे। एक दफा इसका अनुभव हो जाये,फिर आप इसमें गहरे उतर जाएँगे।
कोई विधि नही है शांत होने की, शांत होना जीवन- दृष्टी है।कोई मैथड नही होता की भगवान का नाम जप लिया और शांत हो गये। अशांति को स्वीकार कर ले,दुःख को स्वीकार कर ले,मृत्यु को स्वीकार कर ले,फिर आपकी कोई मृत्यु नही है।

” जिसे हम स्वीकार कर लेते है, उसके हम पार हो जाते हैं “

 

कथा है कि चीन के सम्राट ने बोधिधर्म से पूछाः ‘मेरा चित्त अशांत है, बेचैन है। मेरे भीतर निरंतर अशांति मची रहती है। मुझे थोड़ी शांति दें या मुझे कोई गुप्त मंत्र बताएं कि कैसे मैं आंतरिक मौन को उपलब्ध होऊं।’’

बोधिधर्म ने सम्राट से कहाः ‘आप सुबह ब्रह्यमुहुर्त में यहां आ जाएं, चार बजे सुबह आ जाएं। जब यहां कोई भी न हो, जब मैं यहां अपने झोपड़े में अकेला होऊं, तब आ जाएं। और याद रहे, अपने अशांत चित्त को अपने साथ ले आएं; उसे घर पर ही न छोड़ आएं।’

सम्राट घबरा गया; उसने सोचा कि यह आदमी पागल है। यह कहता हैः ‘अपने अशांत चित्त को साथ लिए आना; उसे घर पर मत छोड़ आना। अन्यथा मैं शांत किसे करूंगा? मैं उसे जरूर शांत कर दूंगा, लेकिन उसे ले आना। यह बात स्मरण रहे।’ सम्राट घर गया, लेकिन पहले से भी ज्यादा अशांत होकर गया। उसने सोचा था कि यह आदमी संत है, ऋषि है, कोई मंत्र-तंत्र बता देगा। लेकिन यह जो कह रहा है वह तो बिलकुल बेकार की बात है, कोई अपने चित्त को घर पर कैसे छोड़ आ सकता है?

सम्राट रात भर सो न सका। बोधिधर्म की आंखें और जिस ढंग से उसने देखा था, पह सम्मोहित हो गया था। मानो कोई चुंबकीय शक्ति उसे अपनी और खींच रही हो। सारी रात उसे नींद नहीं आई। और चार बजे सुबह वह तैयार था। वह वस्तुतः नहीं जाना चाहता था, क्योंकि यह आदमी पागल मालूम पड़ता था। और इतने सबेरे जाना, अंधेरे में जाना, जब वहां कोई न होगा, खतरनाक था। यह आदमी कुछ भी कर सकता है। लेकिन फिर भी वह गया, क्योंकि वह बहुत प्रभावित भी था।

और बोधिधर्म ने पहली चीज क्या पूछी? वह अपने झोपड़े में डंडा लिए बैठा था। उसने कहाः‘अच्छा तो आ गए, तुम्हारा अशांत मन कहां है? उसे साथ लाए हो न? मैं उसे शांत करने को तैयार बैठा हूं।’ सम्राट ने कहाः ‘लेकिन यह कोई वस्तु नहीं है; मैं आपको दिखा नहीं सकता हूं। मैं इसे अपने हाथ में नहीं ले सकता; यह मेरे भीतर है।’

बोधिधर्म ने कहाः ‘बहुत अच्छा, अपनी आंखें बंद करो, और खोजने की चेष्टा करो कि चित्त कहां है। और जैसे ही तुम उसे पकड़ लो, आंखें खोलना और मुझे बताना मैं उसे शांत कर दूंगा।’

उस एकांत में और इस पागल व्यक्ति के साथ-सम्राट ने आंखें बंद कर लीं। उसने चेष्टा की, बहुत चेष्टा की। और वह बहुत भयभीत भी था, क्योंकि बोधिधर्म अपना डंडा लिए बैठा था, किसी भी क्षण चोट कर सकता था। सम्राट भीतर खोजने की कोशिश रहा। उसने सब जगह खोजा, प्राणों के कोने-कातर में झांका, खूब खोजा कि कहां है वह मन जो कि इतना अशांत है। और जितना ही उसने देखा उतना ही उसे बोध हुआ कि अशांति तो विलीन हो गई। उसने जितना ही खोजा उतना ही मन नहीं था, छाया की तरह मन खो गया था।

दो घंटे गुजर गए और उसे इसका पता भी नहीं था कि क्या हो रहा है। उसका चेहरा शांत हो गया; वह बुद्ध की प्रतिमा जैसा हो गया। और जब सूर्योदय होने लगा तो बोधिधर्म ने कहाः ‘अब आंखें खोलो। इतना पर्याप्त जैसा हो गया। और जब सूर्योदय होने लगा तो बोधिधर्म ने कहाः ‘अब आंखें खोलो। इतना पर्याप्त है। दो घंटे पर्याप्त से ज्यादा हैं। अब क्या तुम बता सकते हो कि चित्त कहा है?’

सम्राट ने आंख खोलीं। वह इतना शांत था जितना कि कोई मनुष्य हो सकता है। उसने बोधिधर्म के चरणों पर अपना सिर रख दिया और कहाः ‘आपने उसे शांत कर दिया।’

सम्राट वू ने अपनी आत्मकथा में लिखा हैः ‘यह व्यक्ति अदभुत है, चमत्कार है। इसने कुछ किए बिना ही मेरे मन को शांत कर दिया। और मुझे भी कुछ न करना पड़ा। सिर्फ मैं अपने भीतर गया और मैंने यह खोजने की कोशिश की कि मन कहां है। निश्चित ही बोधिधर्म ने सही कहा कि पहले उसे खोजो कि वह कहां है। और उसे खोजने की प्रयत्न ही काफी था-वह कहीं नहीं पाया गया।’

-ओशो
पुस्तकः तंत्र-सूत्रः 4