मैं आपको एक सूत्र की बात कहूं: जिस मनुष्य के पास प्रेम है उसकी प्रेम की मांग मिट जाती है। और यह भी मैं आपको कहूं: जिसकी प्रेम की मांग मिट जाती है वही केवल प्रेम को दे सकता है। जो खुद मांग रहा है वह दे नहीं सकता है।

इस जगत में केवल वे लोग प्रेम दे सकते हैं जिन्हें आपके प्रेम की कोई अपेक्षा नहीं है—केवल वे ही लोग! महावीर और बुद्ध इस जगत को प्रेम देते हैं। जिनको हम समझ ही नहीं पाते। हम सोचते हैं, वे तो प्रेम से मुक्त हो गए हैं। वे ही केवल प्रेम दे रहे हैं। आप प्रेम से बिलकुल मुक्त हैं। क्योंकि उनकी मांग बिलकुल नहीं है। आपसे कुछ भी नहीं मांग रहे हैं, सिर्फ दे रहे हैं।

प्रेम का अर्थ है: जहां मांग नहीं है और केवल देना है। और जहां मांग है वहां प्रेम नहीं है, वहां सौदा है। जहां मांग है वहां प्रेम बिलकुल नहीं है, वहां लेन-देन है। और अगर लेन-देन जरा ही गलत हो जाए तो जिसे हम प्रेम समझते थे वह घृणा में परिणत हो जाएगा। लेन-देन गड़बड़ हो जाए तो मामला टूट जाएगा। ये सारी दुनिया में जो प्रेमी टूट जाते हैं, उसमें और क्या बात है? उसमें कुल इतनी बात है कि लेन-देन गड़बड़ हो जाता है। मतलब हमने जितना चाहा था मिले, उतना नहीं मिला; या जितना हमने सोचा था दिया, उसका ठीक प्रतिफल नहीं मिला। सब लेन-देन टूट जाते हैं।
प्रेम जहां लेन-देन है, वहां बहुत जल्दी घृणा में परिणत हो सकता है, क्योंकि वहां प्रेम है ही नहीं। लेकिन जहां प्रेम केवल देना है, वहां वह शाश्वत है, वहां वह टूटता नहीं। वहां कोई टूटने का प्रश्न नहीं, क्योंकि मांग थी ही नहीं। आपसे कोई अपेक्षा न थी कि आप क्या करेंगे तब मैं प्रेम करूंगा। कोई कंडीशन नहीं थी। प्रेम हमेशा अनकंडीशनल है। कर्तव्य, उत्तरदायित्व, वे सब अनकंडीशनल हैं, वे सब प्रेम के रूपांतरण हैं।

तो मैं आपसे नहीं कहता आप कैसे कर्तव्य निभाएं। जब आपको यह खयाल ही उठ आया है कि कैसे कर्तव्य निभाएं, तो आप पक्का समझ लें, आपके भीतर कोई प्रेम नहीं है। तो मैं आपसे यह कहूंगा—प्रेम कैसे पैदा हो जाए।

और यह भी आपको इस सिलसिले में कह दूं कि प्रेम केवल उस आदमी में होता है जिसको आनंद उपलब्ध हुआ हो। जो दुखी हो, वह प्रेम देता नहीं, प्रेम मांगता है, ताकि दुख उसका मिट जाए। आखिर प्रेम की मांग क्या है? सारे दुखी लोग प्रेम चाहते हैं। वे प्रेम इसलिए चाहते हैं कि वह प्रेम मिल जाएगा तो उनका दुख मिट जाएगा, दुख भूल जाएगा। प्रेम की आकांक्षा भीतर दुख के होने का सबूत है। तो फिर प्रेम वह दे सकेगा जिसके भीतर दुख नहीं है। जिसके भीतर कोई दुख नहीं है, जिसके भीतर केवल आनंद रह गया है, वह आपको प्रेम दे सकेगा।

अब अगर मेरी बात ठीक से समझें: दुख भीतर हो तो उसका प्रकाशन प्रेम की मांग में होता है और आनंद भीतर हो तो उसका प्रकाशन प्रेम के वितरण में होता है। प्रेम जो है आनंद का प्रकाश है। तो जो आदमी भीतर आनंद से भरेगा उसके जीवन के चारों तरफ प्रेम विकीर्ण हो जाएगा। जो भी उसके निकट आएगा उसे प्रेम उपलब्ध होगा। जो भी उसके करीब होगा उसका कर्तव्य पूरा हो जाएगा, उसका उत्तरदायित्व निभेगा। और उस आनंद के लिए तो मैं आपसे कहा कि अगर मैं कहूं कि प्रेम आनंद का प्रकाश है, तो आनंद आत्मबोध का अनुभव है, उसके पूर्व नहीं है। दुख है कि हम अपने को नहीं जानते, अपने को नहीं जानते इसलिए प्रेम मांगते हैं। अगर हम अपने को जानेंगे, आनंद होगा; आनंद होगा तो प्रेम हमसे विकीर्ण होगा।

❤ आक्रामक प्रेम में डर है
कि कहीं कामवासना छिपी हो।
वास्तविक प्रेम तो प्रार्थनापूर्ण होता है,
वासनापूर्ण नहीं होता।
वास्तविक प्रेम को दूसरे को
गले लगाना जरूरी भी नहीं है।
वास्तविक प्रेम तो एक आशीर्वाद है।
तुम किसी के पास से गुजरे,
आशीर्वाद से भरे हुए गुजरे, काफी है।
आत्मा आत्मा को गले लग गयी,
शरीर को शरीर से लगाने से क्या प्रयोजन है!
कभी-कभी आत्मा के गले लगने के
साथ-साथ शरीर का गले लगना भी घट जाए,
तो शुभ है। लेकिन वह घटे, घटाया न जाए।
कभी ऐसा होगा कि तुम बड़े
आशीर्वाद से भरे हुए किसी के
पास से निकलते थे और
उसके हृदय में भी तुम्हारे आशीर्वाद की
तरंगें पहुंचीं और दोनों एक-साथ
किसी अनजानी शक्ति के वशीभूत होकर
एक-दूसरे के गले लग गये।
तो तुम गले लगे ऐसा नहीं,
दूसरा गले लगा ऐसा नहीं,
प्रेम ने दोनों को गले लगा दिया।
यह बड़ी और घटना है।
जब तुम लगते हो गले, तो वासना है।
तुम्हारी वासना के कारण दूसरा हटेगा।
कृपा करके ऐसा आक्रमण किसी पर मत करना।
तुम दूसरे को भयभीत कर दोगे।
वासना की आंख से देखा जाना किसी को भी पसंद नहीं।
प्रेम की आंख से देखा जाना सभी को पसंद है।
तो दोनों आंखों की परिभाषा समझ लो।
वासना का अर्थ है,
वासना की आंख का अर्थ है कि
तुम्हारी देह कुछ ऐसी है कि
मैं इसका उपयोग करना चाहूंगा।
प्रेम की आंख का अर्थ है,
तुम्हारा कोई उपयोग करने का सवाल नहीं,
तुम हो, इससे मैं आनंदित हूं।
तुम्हारा होना, अहोभाग्य है! बात खतम हो गयी।
प्रेम को कुछ लेना-देना नहीं है।
वासना कहती है, वासना की तृप्ति में और
तृप्ति के बाद सुख होगा;
प्रेम कहता है, प्रेम के होने में सुख हो गया।
इसलिए प्रेमी की कोई मांग नहीं है।
तब तो तुम अजनबी के पास से
भी प्रेम से भरे निकल सकते हो।
कुछ करने का सवाल ही नहीं है।
हड्डियों को हड्डियों से लगा लेने से कैसे प्रेम हो जाएगा! प्रेम तो दो आत्माओं का निकट होना है।
और कभी-कभी ऐसा हो सकता है
कि जिसके पास तुम वर्षों से रहे हो,
बिलकुल पास रहे हो, पास न होओ;
और कभी ऐसा भी हो सकता है
कि राह चलते किसी अजनबी के
साथ तत्क्षण संग हो जाए, मेल हो जाए,
कोई भीतर का संगीत बज उठे,
कोई वीणा कंपित हो उठे। बस काफी है।
उस क्षण परमात्मा को धन्यवाद देकर आगे बढ़ जाना। पीछे लौटकर भी देखने की प्रेम को जरूरत नहीं है।
पीछे लौट-लौटकर वासना देखती है।
और वासना चाहती है कि दूसरा मेरे अनुकूल चले……😍
💗 _*ओशो*_ 💗
🌹 *जिनसूत्र* 🌹
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