प्रश्न- ‘प्रेम का नाता’ क्या होता है? प्रेम और घृणा का आपस में क्या नाता है?

प्रेम और घृणा के बीच वही नाता है जो जन्म और मृत्यु के बीच में है, जो धूप-छाया के बीच में है। जो दिन और रात के बीच में; अमृत और जहर, ठंडक और गर्मी के बीच में है। लेकिन मेरी बात को गलत मत समझना। जब मैं कह रहा हूं अमृत और जहर, तो मैं दो विपरीत तत्वों की बात नहीं कर रहा हूं। एक ही सिक्के के दो पहलुओं की बात कर रहा हूं। जन्म एक पहलू है, मृत्यु उसी का दूसरा पहलू। जिसे तुम प्रेम का नाता कहते हो सामान्य भाषा में, वह घृणा का ही एक रूप है। कम घृणा को हम प्रेम कहते हैं। थोड़े कम प्रेम को हम घृणा कहते हैं। उनमें कुछ खास भेद नहीं है। ‘प्रेमघृणा’-अच्छा हो हम एक नया शब्द बना लें, इकट्ठा। अंग्रेजी में कुछ मनोवैज्ञानिकों ने उपयोग करना शुरू कर दिया है। वे कहते हैं ‘लवहेट’। एक ही शब्द, लव और हेट के बीच में हाईफन (-), जोड़ने वाला चिह्न, भी नहीं है- लवहेट, बस एक शब्द।

वास्तविकता यही है। हम जिसे सामान्यतः प्रेम का नाता कहते हैं, वह घृणा का थोड़ा विरल रूप है। थोड़ी कम घृणा हम जिसको करते हैं उससे हम कहते हैं तुमसे बड़ा प्रेम है। जब घृणा की मात्रा थोड़ी सघन हो जाती है, तब प्रेम की मात्रा कुछ कम हो जाती है। जीवन में सभी चीजों को परिमाण की भाषा में सोचो- डिग्रीज की, प्रतिशत की, मात्रा की। इसलिए, जिसे हम प्रेम करते हैं उसे ही साथ-साथ घृणा भी करते हैं। हाँ, कभी प्रेम पर हमारा एम्फैसिस होता है, कभी हमारा एम्फैसिस घृणा पर होता है। और वे दोनों आपस में परिवर्तनशील हैं, बदलते रहते हैं।

जब मैं कहता हूं आपस का संबंध अमृत और जहर जैसा है, तो यह नहीं सोचना कि मैं कह रहा हूं कि दोनों आपस में एक-दूसरे के विपरीत हैं। अगर अमृत भी कोई बहुत मात्रा में पी ले तो वह जहर साबित हो जाएगा। और जहर भी ठीक खुराक में, ठीक स्थिति में लिया लाए तो अमृत का काम करता है। इतनी औषधियां हैं, ये दवाइयां कहाँ से आती हैं? ये सब बड़ी जहरीली चीजें हैं। लेकिन ठीक परिस्थिति में, उचित बीमारी में, सम्यक्डोज़ में लेने पर, वही जहर औषधि का कार्य करता है, अमृतस्वरूप हो जाता है। अतः अमृत एवं विष में कोई गुणात्मक भेद नहीं है। गुण उनके एक से ही हैं। केवल परिमाण की वजह से उत्पन्न परिणाम का भेद है, मात्रा का अंतर अलग-अलग प्रभाव पैदा करता है। जो एक-एक गोली दिन में तीन बार खानी है, यदि उसकी पचास-पचास गोली दिन भर में दस बार खा ली जाए तो बीमारी दूर करने के बजाय वह नई बीमारी अथवा मृत्यु का भी कारण बन सकती है। तुम कहोगे दवाई तो अमृत होती है, मगर इसे खाने से तो रोग की जगह रोगी खत्म हो जाता है!

जीवन में हम चीजों को द्वंद्व में तोड़कर देखते हैं, और चीजें टूटी हुई नहीं हैं। थोड़े से भेद में बहुत बड़ा भेद पड़ जाता है। क्योंकि गुणात्मक भेद, मात्रात्मक भेद से जन्म जाता है। तो सामान्यतः जिसे हम प्रेम कहते हैं और जिसे घृणा कहते हैं वे एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बड़ी कठिन लगती है यह बात…  लेकिन जिन्दगी ऐसी ही रहस्यपूर्ण है। एक अबूझ पहेली है। यहाँ असंभव घटित होता है। ‘फैक्ट इज़ मोर मिस्टीरियस दैन फिक्शन’।

मैंने सुना है कि मुल्ला नसरुद्दीन ने अपनी पत्नी से परेशान होकर एक रात आत्महत्या करने की सोची। बाजार से जहर खरीदकर लाया। उसने जहर खा लिया, पत्र लिखकर रख दिया कि मैं मर रहा हूं। पत्नी सुबह छः बजे उठी, स्कूल के लिए बच्चों को तैयार करने लगी, उसने पत्र खोलकर देखा। छाती पीटकर रोने लगी। उसका रोना-धोना सुनकर नसरुद्दीन उठकर बैठ गया। वह मरा ही नहीं था, जिन्दा था अभी। भारतीय मिलावटी जहर खाकर इतनी आसानी से कहीं कोई मरता है!

पत्नी बहुत खुश हुई कि मेरे पतिदेव मरे नहीं। उसने पूरे मोहल्ले में घोषणा कर दी कि मिठाई बांटूंगी, प्रसाद बांटूंगी। मिठाई खरीद लाई। शहर की सबसे महंगी शुद्ध मिठाई की दुकान से बढ़िया मिठाई लाई। पूरे मोहल्ले में उसने मिठाई बांटी। खुद भी खाई, बच्चों को खिलाई, नसरुद्दीन को भी खिलाई। बहुत खुश थी कि मेरे पति बच गए। लेकिन वह मिठाई खाकर नसरुद्दीन मर गया, पत्नी भी मर गई, मोहल्ले-पड़ोस के बेचारे बीस लोग और बच्चे भी फुड प्वाइजनिंग से मर गए। शु़द्ध भारतीय मिठाई! यहाँ विष पीकर नहीं मरते…  मिठाई खाकर मर जाते हैं लोग! मीराबाई की कहानी है न- विषपान करके भी नाचती रहीं। धन्यवाद दो मिलावटी भारतीय संस्कृति को!! सुकरात की तरह यूनान में जहर पीती तो बेचारी तुरंत मर जाती।

जीवन में सब चीजें बहुत मिश्रित हैं। यहाँ कहना मुश्किल है कि कौन सी चीज पोषक निकलेगी और कौन सी चीज शोषक साबित होगी? विष और अमृत में भेद विपरीत का नहीं है, भेद मात्रा का है।

इस मिश्रण वाली बात को समझो। इसको न समझने से बड़ी उलझन पैदा होती है। लगता है कि मैं अपनी पत्नी को प्रेम करता हूं और साथ ही साथ, भीतर ही भीतर घृणा भी करता हूं। और बार-बार वह घृणा क्रोध के रूप में, कभी हिंसा के रूप में, कभी ईर्ष्या के रूप में प्रकट होती है। पत्नी सोचती है मैं अपने पति को इतना चाहती हूं लेकिन आश्चर्य–…  कभी-कभी मैं क्यों हिंसात्मक व्यवहार करती हूं? क्योंकि इन दोनों में कुछ विपरीतता नहीं है। एक ही चीज की कम-ज्यादा मात्रा है। कभी एक पहलू सिक्के का सामने होता है, कभी दूसरा पहलू सामने आ जाता है। सिक्का पूरा का पूरा मौजूद है; उसमें दोनों द्वंद्व इकट्ठे समाहित हैं। आम तौर से जिसे तुम प्रेम कहते हो वह सिक्के का मात्र एक पहलू है। पीछे छुपा है, दूसरा पहलू।

पारस्परिक अहंकार का शोषण और पोषण सामान्य प्रेम है।

प्रायः जिसे हम कहते हैं प्रेम का संबंध, वह परस्पर एक-दूसरे के अहंकार का पोषण है। हम पुष्ट करते हैं एक-दूसरे के अहंकार को। प्रशंसा करते हैं कि तुम बहुत सुंदर हो, तारीफ करते हैं कि कितने ज्ञानवान हो, कि तुम्हारे जैसा कोई व्यक्ति कभी देखा ही नहीं, लाखों में एक। दूसरा व्यक्ति महसूस करता है कि वह बहुत प्रेम पा रहा है। बदले में वह भी तुम्हारे अहंकार की तारीफ करता है। पारस्परिक अहंकार का पोषण चलता है। और इस पोषण के साथ ही जुड़ा हुआ है शोषण। ये प्रशंसा के पुल यूं ही नहीं बांधे जा रहे हैं। ये स्तुति के गीत मुफ्त में नहीं सुनाए जा रहे हैं। इसके बदले में कुछ हासिल किया जाएगा। यह तारीफ, ये कविताएं, ये गीत मुफ्त नहीं हैं। इनकी कीमत चुकानी पड़ेगी। और यह खेल परस्पर चल रहा है। दोनों व्यक्ति एक-सा ही काम कर रहे हैं। एक-दूसरे के अहंकार को पुष्ट कर रहे हैं। तो सामान्यतः हम जिसे प्रेम कहते हैं वह अहंकार का पोषण है। और उसके पीछे छुपा हुआ है एक दूसरे का शोषण। इसलिए जल्दी ही वह घृणा में बदल जाता है। कभी प्रेम वाला पक्ष उजागर होता है, फिर कहीं घृणा वाला पक्ष सामने आ जाता है। और दिन-रात की तरह वह डोलते रहते हैं। इसलिए मैंने कहा कि प्रेम और घृणा का संबंध धूप-छाँव जैसा, दिन-रात जैसा, जहर-अमृत जैसा है।

 तुम पूछती हो कि प्रेम का नाता क्या है?

प्रेम एक इंद्रधुनष है, एक पूरी रेंज है। इसको केवल दो टुकड़ों में तोड़ कर ही मत समझो। छोटे-छोटे विभाजन करो तो बात और स्पष्ट हो सकेगी। यदि इंद्रधुनष में हम चुन लें बैंगनी और लाल रंग तो लगता है एक दूसरे के विपरीत हैं। लेकिन जब हम पूरी रेंज को देखें तो सात रंग उसमें छाए हुए हैं, तब हमें पता चलता है कि ये तो एक-दूसरे में परिवर्तनशील हैं। वह बैंगनी ही नीला हो जाता है। बैंगनी और नीले में उतना भेद नहीं है। नीला और पीला के बीच में हरा है। अब बात समझ में आती है कि नीला और पीला रंग जहाँ ओवरलैप कर रहा है वह हरा बन गया। इसी प्रकार और दूसरे भी रंग हैं। पूरी रेंज को समझो तो फिर जो अल्ट्रा-वॅायलेट और इन्फ्रा-रेड है, इन्द्रधनुष के पार के रंग भी एक सीक्वेंस में, एक क्रम में दिखाई देते हैं; और एक-दूसरे में परिवर्तनशील हैं, यह बात भी समझ में आती है। फिर इनके भीतर की विपरीतता खो जाती है, और तारतम्यता प्रगट होती है।

ठीक इसी प्रकार प्रेम का नाता भी एक इंद्रधनुष है। भिन्न-भिन्न दिखाई देने वाले रंग भी एक ही श्वेत रंग से निकले हैं। जैसे सूरज की सफेद किरण, इंद्रधनुष में सात रंग की दिखाई देने लगती है, ठीक वैसे ही हमारी जीवन ऊर्जा सात रंगों में अभिव्यक्त होती है।

सबसे पहला समझो मोह; वस्तुओं के प्रति, मकान के प्रति, सामानों के प्रति, स्थानों के प्रति जो हमारी पकड़ है वह भी प्रेम का ही एक स्थूल रूप है। उसे हम कहते हैं मोह, अटैचमेंट। यह मेरा सामान है, यह मेरा मकान, मेरी कार, मेरा फर्नीचर, मेरे गहने; यह जो मेरे की पकड़ है वस्तुओं के ऊपर, यह सर्वाधिक निम्न कोटि का प्रेम है। लेकिन है तो वह भी प्रेम ही। उसे इंकार नहीं किया जा सकता है कि वह प्रेम नहीं है। वह भी प्रेम है। राजनीति पद व शक्ति के प्रति प्रेम है, लोभ धन-संपत्ति के प्रति प्रेम है।

उससे ऊपर है, दूसरे तल पर देह का प्रेम, जो कामवासना का रूप ले लेता है। तो पहला प्रकार हुआ वस्तुओं के प्रति प्रेम जो मोह का रूप ले लेता है और दूसरे प्रकार का प्रेम हुआ देह के प्रति प्रेम जो वासना का रूप ले लेता है।

तीसरा प्रेम है विचारों का, मन का प्रेम। जिसे हम कहते हैं मैत्री भाव। यहाँ देह का सवाल नहीं है। वस्तु का भी सवाल नहीं है। मन आपस में मिल गए तो मित्रता हो जाती है। मन के तल का प्रेम, विचार के तल का प्रेम दोस्ती है।

चौथा है हृदय के तल पर, जिसे हम कहते हैं- प्रीति। सामान्यतः हम इसे ही भावनात्मक प्रेम कहते हैं। उसे यहाँ बीच में रख सकते हैं, चौथे सोपान पर; क्योंकि तीन रंग उसके नीचे हैं, तीन रंग उसके ऊपर हैं। तो चौथा है हृदय के तल पर प्रीति का भाव; अपने बराबर वालों के साथ हृदय का जो संबंध है- भाई-भाई के बीच, पति-पत्नी के बीच, पड़ोसियों के बीच। इसके दो प्रकार और हैं- अपने से छोटों के प्रति वात्सल्य भाव है, स्नेह है। अपने से बड़ों के प्रति आदर का भाव है; ये भी प्रीति के ही रूप हैं।

पांचवें प्रकार का प्रेम आत्मा के तल का प्रेम है। इसमें भी दो प्रकार हो सकते हैं। जब हमारी चेतना का प्रेम स्वकेंद्रित होता है तो उसका नाम ध्यान है। और जब हमारी चेतना परकेंद्रित होती है, उसका नाम श्रद्धा है। गुरु के प्रति प्रेम श्रद्धा बन जाता है।

चेतना के बाद छठवें तल का प्रेम घटता है जब हम ब्रह्म से, परमात्मा से परिचित होते हैं। वहाँ समाधि घटित होती है। वह भी प्रेम का एक रूप है। अतिशुद्ध रूप। अब वहाँ वस्तुएं न रहीं, देह न रही। विचारों के पार, भावनाओं के भी पार पहुंच गए। तो समाधि को कहें पराभक्ति, परमात्मा के प्रति अनुरक्ति।

उसके बाद अंतिम एवं सातवां प्रकार है- अद्वैत की अनुभूति। कबीर कहते हैं- प्रेम गली अति सांकरी ता में दो न समाई। जब अद्वैत घटता है तो न मैं रहा, न तू रहा; न भगवान रहा, न भक्त बचा। कोई भी न बचा। वह प्रेम की पराकाष्ठा है। ये सात रंग हैं प्रेम के इंद्रधनुष के, ऐसा समझें।

सबसे पहला है मोह, वस्तुओं के प्रति। दूसरा सेक्स, देह के प्रति। तीसरा मैत्री, विचारों के प्रति। चौथा प्रीति, भावना के प्रति। पांचवां चैतन्य के प्रति प्रेम, जिसके दो रूप हो सकते हैं; जो लोग स्वकेंद्रित हैं वे ध्यान करेंगे, जो लोग परकेंद्रित हैं वे श्रद्धा में डूबेंगे। छठवां तल है परमात्मा के प्रति प्रेम, सर्वात्मा के प्रति प्रेम का नाम है-पराभक्ति। और सातवां है अद्वैत की अनुभूति; यह नाता नहीं, प्रेम की पराकाष्ठा है जहाँ दो नहीं बचते। यह प्रेम की अंतिम मंजिल है जहाँ द्वैत खो गया, दुई समाप्त हो गयी। इस मंजिल के पहले कहीं भी रुकना मत। शेष सब सीढ़ियां हैं। जब तक तुम मंजिल पर ही न पहुंच जाओ प्रेम की, तब तक कहीं भी मत रूकना। चलते चलना, चलते चलना, चरैवेति-चरैवेति। काम से राम तक की लंबी है यात्रा। अहम् से ब्रह्म तक का है सफर। इसमें मध्य का पड़ाव है प्रेम। अगर तुम तीन खंडों में तोड़ना चाहो तो कह सकते हो- अहम्, प्रेम, ब्रह्म। या कह लो काम, प्रेम, राम। प्रेम बीच में है। इसलिए मैंने प्रेम को चौथी सीढ़ी पर रखा उसके दोनों तरफ तीन-तीन पायदान हैं। अगर वह नीचे की तरफ गिरे तो मोह बन जाता है, कामवासना बन जाता है, दोस्ती बन जाता है। यदि वह ऊपर उठे तो ध्यान अथवा श्रद्धा बन जाता है, पराभक्ति बन जाता है और अंततः अद्वैत में ले जाता है।

प्रेम के इस पूरे इंद्रधनुष को देखो। फिर तुम्हारे सवाल को समझना आसान होगा कि प्रेम और घृणा का आपस में क्या नाता है? जितने नीचे के तल पर आओगे उतनी ही घृणा की मात्रा बढ़ती जाएगी, प्रेम की मात्रा कम होती जाएगी। जितने ऊपर जाओगे, घृणा की मात्रा कम होती जाएगी, प्रेम की मात्रा बढ़ती जाएगी। प्रेम का शुद्धिकरण होता जाएगा। एक ही ऊर्जा का खेल है प्रेम और घृणा। सबसे निम्नतम तल पर प्रेम करीब-करीब नहीं के बराबर है, घृणा ही घृणा है। जितने ऊपर जाओगे, वहाँ पर घृणा शून्य हो जाएगी, प्रेम परिपूर्ण हो जाएगा। और बीच में जिसे हम सामान्य भाषा में प्रेम कहते हैं, वह चौथी सीढ़ी पर है, उसमें तो मिश्रण है फिफ्टी-फिफ्टी। वहाँ जहर और अमृत आपस में घुले-मिले हुए हैं। दोनों एक साथ हैं और इस पर निर्भर करता है कि तुम स्वयं को क्या समझते हो?

क्या तुम स्वयं को देह समझते हो? तो तुम्हारा प्रेम कामवासना ही होगा। दूसरे से तुम उसी तल पर संबंधित हो पाओगे जिस तल पर तुम स्वयं को जानते हो। यदि तुम स्वयं को मन समझते हो तो तुम्हारा संबंध दोस्ती का बनेगा। यदि तुम स्वयं को हृदय मानते हो, भावनाओं के तल पर जीते हो तब तुम्हारा प्रेम मध्य में होगा। यदि तुम स्वयं को चैतन्य समझते हो कि मैं चैतन्य हूं, मैं साक्षी आत्मा हूं तब तुम्हारा दूसरे से जो प्रेम होगा वह चेतना के तल पर होगा। दूसरे में तुम वही देखते हो जो स्वयं के भीतर देख पाते हो। ऐसा नहीं हो सकता कि तुम स्वयं देह केंद्रित हो और दूसरे के भीतर की चेतना को जान पाओ। यह संभव नहीं। यदि तुम स्वयं के भीतर अपनी चेतना को महसूस करते हो तो दूसरे के भीतर भी तुम चेतना को महसूस कर पाओगे। तब तुम्हारा प्रेम उच्चतर होता चला जाएगा। जब तुम अपने भीतर भगवत्ता को जान लेते हो तब तुम सारे जगत के कण-कण में उसी भगवान को पहचानते हो। तब तुम्हारा प्रेम भक्ति बन जाता है। और एक दिन वह अद्भुत घटना भी घटती है जिसका नाम बुद्धत्व है। जहाँ भक्त और भगवान का द्वैत भी मिट जाता है। फिर वहाँ कोई नाता नहीं है। नाता तो दो के बीच घटता है।

एक शब्द तुमने सुना है ब्रह्मचर्य। मैं दो नये शब्द निर्मित करना चाहता हूं। ब्रह्म को जानकर जो चर्या है, वह ब्रह्मचर्य कहलाती है, तो अहम् के तल पर जो जी रहा है उसके आचरण को कहना चाहिए अहम्चर्य। और मध्य में जो है उसका नाम होना चाहिए प्रेमचर्य। तीन तरह के संबंध इस अस्तित्व से तुम्हारे हो सकते हैं- अहम्चर्य, प्रेमचर्य और ब्रह्मचर्य; और ये तीनों आपस में विपरीत नहीं हैं। ये आपस में सोपान की तरह एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। निचले पायदान से ऊपरी पायदान तक हमें जाना है। ‘नाता’ वाले प्रेम से ‘अनाता’ वाले परम-प्रेम तक ऊर्ध्वगमन करना है।

– ओशो