ओशो:- ऐसा लगता है, बहुत बार तुम सोचते भी नहीं कि क्या पूछ रहे हो! प्रेम और समर्पण का एक ही अर्थ होता है। प्रेम के बिना कैसा समर्पण। और अगर समर्पण न हो तो कैसा प्रेम! प्रेम के बिना तो समर्पण हो ही नहीं सकता। प्रेम के बिना जो समर्पण होता है, वह समर्पण नहीं है, जबरदस्ती है।

जैसे किसी आदमी ने तुम्हारी छाती पर छुरी रख दी और कहा, करो समर्पण! और तुम्हें करना पड़ा। उसने कहा, चलो करो समर्पण घड़ी, तुम्हारा बटुआ, समर्पण करो। अब छुरी के घबड़ाहट में तुमने समर्पण कर दिया, यह समर्पण तो नहीं है। यह तो मजबूरी है। इससे तो तुम बदला लोगे, मौका मिल जाएगा तो तुम इसे छोड़ोगे नहीं। यह समर्पण नहीं है, यह तो हिंसा हुई।

समर्पण का अर्थ है, स्वेच्छा से, अपनी मर्जी से। तुम पर कोई दबाव न था, कोई जोर न था, कोई कह नहीं रहा था, कोई तुम्हे किसी तरह से मजबूर नहीं कर रहा था। तुम्हारा प्रेम था, प्रेम में तुम झुके, तो समर्पण। प्रेम में ही समर्पण हो सकता है।

और जहां प्रेम है, अगर समर्पण न हो तो समझ लेना प्रेम नहीं है। आमतौर से लोग यह कोशिश करते हैं कि प्रेम के नाम पर समर्पण करवाते हैं। तुम्हें मुझसे प्रेम है, करो समर्पण! अगर प्रेम है तो समर्पण होगा ही, करवाने की जरूरत नहीं पडेगी। बाप कहता है कि मैं तुम्हारा बाप हूं तुम बेटे हो, मुझे प्रेम करते हो? तो करो समर्पण। पति कहता है पत्नी से कि सुनो, तुम मुझे प्रेम करती हो? तो करो समर्पण। प्रेम है तो समर्पण हो ही गया, करवाने की कोई जरूरत नहीं है। जो समर्पण करवाना पड़े, वह समर्पण ही नही। जो हो जाए, जो सहज हो जाए। अगर सहज न हो तो तुम एक झूठी मुद्रा में उलझ गए। एक नकली मुद्रा में उलझ गए•••••••

एस धम्मो सनंतनो,
ओशो