स्त्री और पुरुष के बीच कोई स्थिर संबंध निर्मित नहीं हो पाता। हो भी नहीं सकता। सब संबंध अस्थिर होंगे। क्षण भर पहले जहां प्रेम है, क्षण भर बाद वहीं घृणा हो जाए। यह स्वाभाविक है। इसको बदलने का भी कोई उपाय नहीं है। ऐसा है जब तक कि व्यक्ति अंदर की तरफ यात्रा पर न निकल जाए।

स्त्री और पुरुष बुनियादी रूप से भिन्न हैं। भिन्न से यह अर्थ नहीं है कि वे ऊंचे-नीचे हैं। दोनों समान हैं, लेकिन एक-दूसरे से बिल्कुल विपरीत हैं। और यह उनकी विपरीतता जरूरी है। इन दो विपरीतताओं से मिलकर ही तो जीवन की धारा बहती है। वे विपरीत हैं, इसलिए उनमें आकर्षण है और कलह भी है। उनके बीच कभी भी सुलह नहीं हो पाती है। उनकी विपरीतता के कारण खिंचाव है और विपरीतता के कारण ही आकर्षण भी।

पुरुष अधूरा है, स्त्री के बिना; स्त्री अधूरी है, पुरुष के बिना। पुरुष पूरा होना चाहता है स्त्री के साथ। स्त्री भी पूरी होना चाहती है पुरुष के साथ। लेकिन जिससे हम पूरे होना चाहते हैं, वह हमारे विपरीत है। विपरीत है, तो एक निश्चित कलह भी मौजूद है, एक तनाव भी है। पास भी आते हैं और दूर भी जाते हैं।
शरीर से समझें, तो फिर भीतर की बात भी समझ में आ जाएगी क्योंकि शरीर का जो ढंग है, वही भीतर के व्यक्तित्व का भी ढंग है। पुरुष आक्रामक है, स्त्री अनाक्रामक है। पुरुष सक्रिय है, स्त्री निष्क्रिय है। पुरुष प्रेम करता है, स्त्री प्रेम लेती है। जैविक तल पर भी, बायॉलजी के तल पर भी, पुरुष देता है वीर्य-कण, स्त्री अंगीकार करती है। वहां भी पुरुष पहल करता है, इनिशिएटिव लेता है। कोई स्त्री किसी पुरुष से जाकर सीधा नहीं कहती कि मैं तुम्हें प्रेम करती हूं। प्रतीक्षा करती है कि पुरुष उससे कहें। स्त्री उसके निवेदन पर हां या न भरेगी। लेकिन निवेदन नहीं करेगी और जो स्त्री किसी पुरुष से निवेदन करेगी कि मुझे तुमसे प्रेम है, उस पुरुष की उत्सुकता उस स्त्री में नहीं हो सकती, क्योंकि वह स्त्री, पुरुष जैसा व्यवहार कर रही है।
चीन में बहुत पुराने दिनों से दो शब्द उपयोग में आते रहे हैं : यिन और यांग। यिन स्त्री और यांग पुरुष। स्त्री है खाई की तरह, पुरुष है पर्वत-शिखर की तरह। स्त्री है ग्राहक, क्योंकि गर्भ उसमें निर्मित होगा। पुरुष गर्भ नहीं रख सकता है। बच्चे के जन्म में पुरुष का एक क्षण का संबंध होता है। स्त्री का संबंध बहुत गहरा है। बच्चा उसके भीतर बड़ा होगा। इसलिए मां और बच्चे के बीच जो निकटता और आत्मीयता है, वह पिता और बच्चे के बीच नहीं हो सकती है। मां और बच्चे तो जैसे एक ही चीज का विस्तार हैं। वह आक्रामक हो ही नहीं सकती।दक