भगवान श्री रजनीश साधारणतः ओशो – Osho, आचार्य रजनीश और रजनीश के नाम से भी जाने जाते है, वे एक भारतीय तांत्रिक और रजनीश अभियान के नेता थे। अपने जीवनकाल में उन्हें एक विवादास्पद रहस्यवादी, गुरु और आध्यात्मिक शिक्षक माना गया था।

ओशो ने अपने संपूर्ण जीवनकाल में 35 साल तक जमकर बोलने का कीर्तिमान बनाया। उनके प्रवचन 5 हजार घंटों की रिकॉर्डिंग व 650 से अधिक पुस्तकों की शक्ल में उपलब्ध हैं। युक्रांद, रजनीश टाइम्स, ओशो टाइम्स, ओशो वर्ल्ड, यैस ओशो जैसी पत्रिकाएं उनके विचारों की प्रचारक रही हैं। देश-विदेश में कई ओशो आश्रम संचालित हैं। उनका संदेश था कि जन्म और मृत्यु, जीवन के दो छोर नहीं हैं, जीवन में बहुत बार जन्म, बहुत बार मृत्यु घटती है। जीवन का अपना कोई प्रारंभ नहीं है, कोई अंत नहीं है, जीवन और शाश्वतता समान हैं। वे कहते हैं ध्यान है तो सब है ध्यान नहीं तो कुछ भी नहीं। उत्सव आमार जाति, उत्सव आमार गोत्र यह भी उनका महासंदेश था। वे पृथ्वी पर ऐसे मानव की कल्पना कर गए जो भौतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से परिपूर्ण हो, इसे उन्होंने जोरबा दि बुद्धा नाम दिया। महासागर की पुकार ओशो का कहना था कि ओठों से कहोगे, बात थोथी और झूठी हो जाएगी। प्राणों से कहनी होगी। और जहां आनंद है, वहां प्रेम है और जहां प्रेम है वहां परमात्मा है।

1960 में उन्होंने सार्वजनिक वक्ता के रूप में पुरे भारत का भ्रमण किया था और महात्मा गांधी और हिन्दू धर्म ओथडोक्सी के वे मुखर आलोचक भी थे। मानवी कामुकता पर भी वे सार्वजनिक जगहों पर अपने विचार व्यक्त करते थे, इसीलिए अक्सर उन्हें “सेक्स गुरु” भी कहा जाता था, भारत में उनकी यह छवि काफी प्रसिद्ध थी, लेकिन बाद में फिर इंटरनेशनल प्रेस में लोगो ने उनके इस स्वभाव को अपनाया और उनका सम्मान किया।

1970 में रजनीश ने ज्यादातर समय बॉम्बे में अपने शुरुवाती अनुयायीओ के साथ व्यतीत किया था, जो “नव-सन्यासी” के नाम से जाते थे। इस समय में वे ज्यादातर आध्यात्मिक ज्ञान ही देते थे और दुनियाभर के लोग उन्हें रहस्यवादी, दर्शनशास्त्री, धार्मिक गुरु और ऐसे बहुत से नामो से बुलाते थे।

1974 में रजनीश पुणे में स्थापित हुए, जहाँ उन्होंने अपने फाउंडेशन और आश्रम की स्थापना की ताकि वे वहाँ भारतीय और विदेशी दोनों अनुयायीओ को “परिवर्तनकारी उपकरण” प्रदान कर सके। 1970 के अंत में मोरारी देसाई की जनता पार्टी और उनके अभियान के बीच हुआ विवाद आश्रम के विकास में रूकावट बना।

1981 में वे अमेरिका में अपने कार्यो और गतिविधियों पर ज्यादा ध्यान देने लगे और रजनीश फिर से ऑरेगोन के वास्को काउंटी के रजनीशपुरम में अपनी गतिविधियों को करने लगे। लेकिन फिर वहाँ भी राज्य सरकार और स्थानिक लोगो के मदभेद के चलते उनके आश्रम के निर्माण कार्य को घटाया गया था।

1985 में कुछ गंभीर केसों पर छानबीन की गयी जिनमे 1984 का रजनीश बायोटेरर अटैक और यूनाइटेड स्टेट प्रतिनिधि चार्ल्स एच. टर्नर की हत्या का केस भी शामिल है। इसके बाद अल्फोर्ड दलील सौदे के अनुसार वे यूनाइटेड स्टेट से स्थानांतरित हो चुके थे।

11 दिसम्बर 1931 : ओशो का जन्म मध्य भारत के मध्यप्रदेश राज्य के एक छोटे से गाँव कुचवाडा में हुआ था। जैन कपडा व्यापारी के ग्यारह बच्चो में वे सबसे बड़े थे। उनकी बचपन की कहानियो के अनुसार वे एक स्वतंत्र और बलवई बालक थे, जो हमेशा सामाजिक, धार्मिक और दर्शनशास्त्र के मुद्दों पर प्रश्न पूछते रहते थे। युवावस्था में उन्होंने ध्यान लगाना शुरू किया था।

ओशो का स्कूल
एक दिन में पढ़ते थे तीन पुस्तकें
प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के दौरान जब बच्चे और किशोर कहानियों और काल्पनिक दुनिया में डूबे रहते हैं तब ओशो ने न सिर्फ जीवन के रहस्यों को समझाने वाली, बल्कि पूरी दुनिया के लोगों और उनसे संबंधित किताबों का अध्ययन कर डाला। ओशो के पढ़ने की जिज्ञासा का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि गाडरवारा के बहुत पुराने श्री सार्वजनिक पुस्तकालय में वे एक दिन में तीन किताबें पढ़ा करते थे। अगले दिन फिर वे इन किताबों को जमा करके नयी किताबें ले जाया करते थे। आज भी ओशो के हस्ताक्षर की हुईं किताबों की धरोहर इस पुस्तकालय में सहेजकर रखी गई है। उस समय ओशो अपना नाम रजनीश चंद्रमोहन लिखा करते थे। इस समय ओशो ने जर्मनी के इतिहास, हिटलर, मार्क्स, भारतीय दर्शन आदि से संबंधित किताबों का अध्ययन कर डाला था।

कभी पुल से कूदकर, तो कभी कुएं में उतरकर नहाना

ओशो के बालसखा बताते हैं कि लोग रजनीश को अजीब कहा करते थे। जहां ओशो रहा करते थे वह स्थान आज प्रभु निवास के नाम से एक धर्मशाला के रूप में परिवर्तित हो चुका है। इसी में एक कमरे में ओशो रहा करते थे और इसी भवन में एक कुआं है जिसमें सीढ़ियां बनी हुई हैं। इस कुएं के अंदर उतरकर ओशो घंटों नहाया करते थे। इसी तरह गाडरवारा की शक्कर नदी पर बने रेलवे पुल से कूदकर भी उन्होंने जलक्रीड़ा की है। शक्कर नदी के रामघाट पर भी वे घंटों नदी में डूबे रहते थे।

21 मार्च 1953 : 21 साल की उम्र में जबलपुर के डी.एन. जैन कॉलेज में दर्शनशास्त्र की पढाई करते हुए ओशो प्रबुद्ध बने।

1956 : सागर यूनिवर्सिटी से दर्शनशास्त्र में फर्स्ट क्लास से एम.ए. की डिग्री हासिल की।

ग्रेजुएशन की पढाई पूरी करते समय वे ऑल इंडिया डिबेट चैंपियन और गोल्ड मैडल विजेता भी रह चुके है।

1957-1966 – यूनिवर्सिटी प्रोफेसर और सार्वजानिक वक्ता।

1957-1966 – रायपुर के संस्कृत कॉलेज में उनकी नियुक्ती प्रोफेसर के पद पर की गयी थी।

1958 : जबलपुर यूनिवर्सिटी में उनकी नियुक्ती दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर के पद पर की गयी, जहाँ उन्होंने 1966 तक पढाया था। एक शक्तिशाली डिबेटर के रूप में, उन्होंने पुरे भारत की यात्रा कर रखी थी, बड़े पैमाने पर सार्वजनिक जगहों पर वे बोलते थे।

1966 : 9 साल तक पढ़ाने के बाद, उन्होंने खुद को पूरी तरह से मानवी चेतना में समर्पित कर देने के लिए यूनिवर्सिटी में पढ़ाना छोड़ दिया। इसके बाद उन्होंने भारत में खुले मैदानों पर तक़रीबन 20000 से 50000 लोगो को भाषण देना शुरू किया। इतना ही नहीं बाकि साल में चार बार वे भारत के मुख्य शहरो में 10 दिन के ध्यान और व्यायाम शिबिर का भी आयोजन करते थे।

1970 में 14 अप्रैल को उन्होंने खुद की क्रांतिकारी ध्यान यंत्रनाओ को उजागर किया था, जिससे उनके जीवन में एक नए अध्याय की शुरुवात हुई। क्योकि उनके द्वारा बताई गयी ध्यान यंत्रनाओ का उपयोग मेडिकल डॉक्टर, शिक्षक और दुनियाभर में बहुत से लोग ध्यान लगाने के लिए करते थे।

1969-1974 – मुंबई में बिताये हुए साल।

1960 के अंतिम दिनों में : उनके हिंदी भाषण अंग्रेजी में भी अनुवाद करके लोगो को उपलब्ध कराये गये थे।

1970 : जुलाई 1970 में वे मुंबई चले गये, जहाँ वे 19’74 तक रहे थे।

1970 : ओशो को इस समय भगवान श्री रजनीश का नाम दिया गया था – इस समय उनके अनुयायीओ को नव-संस्यासी का नाम दिया गया था। और अपनी ध्यान यंत्रनाओ और अपने शब्दों से वे लोगो को मंत्रमुग्ध कर देते थे, इस समय में उन्होंने वैश्विक स्तर पर खुद को प्रसिद्ध बनाया। वे लोगो को सन्यास शब्द का महत्त्व समझाते थे। उनके अनुसार मानव को नश्वर चीजो की मोह-माया नही होनी चाहिए और ना ही हमें भूतकाल के बारे में ज्यादा सोचना चाहिए।

इसके साथ-साथ वे राजस्थान के माउंट अबू में अपने ध्यान शिबिर भी लिया करते थे, और उन्होंने सार्वजनिक जगहों पर बोलने के आमंत्रण को अपनाने से इंकार कर दिया। इस समय से वे अपना पूरा समय नव सन्यासियों धार्मिक और आध्यात्मिक ध्यान देने में ही व्यतीत करते थे।

इस समय में, उनके आश्रम में विदेशी लोग भी आया करते थे और उन्हें नव-सन्यासियो का नाम दिया गया था। यूरोप और अमेरिका में लोग उन्हें मनोचिकित्सक भी कहते थे, क्योकि विदेशी लोगो के अनुसार वे इंसान का आंतरिक विकास करते थे।

1974-1981 – पुणे आश्रम

इन सात सालो के समय में वे रोज़ सुबह तक़रीबन 90 मिनट का प्रवचन देते थे, उनके यह प्रवचन हिंदी और इंग्लिश दोनों भाषाओ में होते थे। उनके प्रवचन में सभी आध्यात्मिक और धार्मिक तथ्यों का उल्लेख होता था, जिनमे योगा, जेन, ताओवाद, तंत्र और सूफी विद्या का भी समावेश था। इसके साथ-साथ वे गौतम बुद्धा, जीसस, लाओ तजु और दुसरे रहस्यवादी लोगो पर भी प्रवचन देते थे। इन प्रवचन को बड़े पैमाने पर लोग सुनते थे और तक़रीबन इन्हें 50 से भी ज्यादा भाषाओ में स्थानांतरित किया जा चूका है।

इस वर्षो में शाम के समय वे लोगो की बीजी जिंदगी से जुड़े प्रश्नों का जवाब देते थे, जो ज्यादातर प्यार, जलन, ध्यान और क्रोध इत्यादि विषयो पर आधारित होते थे। इन दर्शनों को 64 डायरी में संकलित किया गया है जिनमे से 40 को प्रकाशित भी किया जा चूका है।

ध्यान लगाने के लिए ओशो ने बहुत सी थेरेपी भी बताई थी, जो इस समय में पश्चिमी देशो और भारत में काफी प्रसिद्ध और प्रभावशाली साबित हुई थी। पश्चिमी मनोविज्ञान के अनुसार उनकी थेरेपी के बहुत से फायदे थे। दुनिया के बहुत से थेरापिस्ट उनकी ध्यान साधनाओ से काफी प्रभावित हो चुके थे, 1980 में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने उनके आश्रम को “दुनिया का सर्वश्रेष्ट विकसित और सबसे अच्छा थेरेपी सेंटर” भी बताया था।

1981 : उन्होंने अपक्षायी वापसी की परिस्थिति को विकसित किया। मार्च 1981 में तक़रीबन 15 सालो तक रोज प्रवचन देने के बाद ओशो ने तीन साल का मौन व्रत रखा। क्योकि शायद उन्हें लगा की उन्हें किसी आपातकालीन सर्जरी की जरुरत है और अपने निजी डॉक्टरो की सलाह पर, इसी साल उन्होंने यूनाइटेड स्टेट की यात्रा भी की। उसी साल अमेरिका में उनके भक्तो ने 64,000 एकर खेती ओरेगन में खरीदी और वहाँ उन्होंने ओशो को आमंत्रित किया था। इसके बाद अचानक वे यूनाइटेड स्टेट में रहने के लिए राजी हुए और उनकी तरफ से यूनाइटेड स्टेट का रहवासी होने का एप्लीकेशन भी उन्होंने वहाँ दे रखा था।

1981-1985 – रजनीशपुरम
एक मॉडल एग्रीकल्चर कम्यून को सेंट्रल ऑर्गेनियन हाई डेजर्ट ने बर्बाद किया। स्थापित किया गया रजनीशपुरम शहर लगभग 5,000 रहवासियों को सर्विस देते थे। इसके बाद हर साल यहाँ समर फेस्टिवल का भी आयोजन किया गया था। जल्द ही रजनीशपुरम एक प्रसिद्ध धार्मिक समुदाय बन चूका था।

अक्टूबर 1984 : ओशो के मौन को साढ़े तीन साल पुरे हुए।

जुलाई 1985 : उन्होंने अपने सार्वजानिक प्रवचनों को पुनः शुरू किया और हर सुबह 2 एकर के ध्यान केंद्र में हजारो लोग उनका प्रवचन सुनने आते थे।

सितम्बर-अक्टूबर 1985 : ऑरेगोन कम्यून को बर्बाद किया गया।

14 सितम्बर : ओशो की पर्सनल सेक्रेटरी माँ आनंद शीला और कम्यून के बहुत से सदस्यों ने मैनेजमेंट अचानक अच्चोद दिया और उनके आश्रम को एक अवैध काम करने वाला आश्रम बताया। इन कामो में विषाक्तीकरण, आगजनी, तार में जोड़ लगाकर सुनना और हत्या करने की कोशिश करने जैसे काम शामिल थे। इसके बाद ओशो ने शीला की जुर्म पर ओशो ने लॉ इंफोर्समेंट ऑफिसियल को भी आमंत्रित किया था। क्योकि, छानबीन ही पूरी कम्यून के विनाश का एक अच्छा अवसर था।

23 अक्टूबर : पोर्टलैंड की ए.यु.एस. फ़ेडरल ग्रैंड जूरी ने ओशो और 7 दुसरे लोगो पर आप्रवासी छल के आरोप लगाए गये।

28 अक्टूबर – बिना किसी वारंट के, फ़ेडरल और स्थानिक अधिकारियो ने ओशो और उनके दुसरे सदस्यों को चार्लोट में गिरफ्तार कर लिया। दूसरो को बाद में छोड़ दिया गया था और उन्हें भी बिना किसी बेल के 12 दिनों तक छोड़ दिया गया था। इसके बाद ऑरेगोन वापिस जाने के लिए चार दिन लगे थे।

नवम्बर : ओशो के आप्रवासी छल वाले केस में ओशो को सार्वजानिक प्रसिद्धि मिलती गयी और साथ में भावुक लोगो का साथ भी मिलता गया। लाखो मासूम और भोले भक्तो का साथ ओशो को इस केस में मिलता गया जिनपर कुल 35 आरोप लगे हुए थे। ओशो को कोर्ट ले जाते समय भी कोर्ट में उनके साथ पूरा जनसैलाब मौजूद था। और उनके भक्तो ने कोर्ट में भी मासूम बनने का नाटक किया और ओशो को भी भोला और मासूम बताया। इसके बाद ओशो पर 400,000 $ का जुर्माना लगाया गया और उन्हें अमेरिका से निर्वासित भी किया गया।

1985-1986 – वर्ल्ड टूर

जनवरी-फरवरी –उन्होंने नेपाल में काठमांडू की यात्रा की और अगले दो महीने पर रोज़ दो बार बोलते थे। फरवरी में नेपाली सरकार ने उनके दर्शनार्थियों और उनसे जुड़े हुए सदस्यों को वीजा देने से इंकार कर दिया था। इसके बाद उन्होंने नेपाल छोड़ दिया था और वे वर्ल्ड टूर पर चले गये थे।

फरवरी-मार्च – सबसे पहले वे ग्रीस गये, वहाँ 30 दिनों तक का उनका वीजा वैध था। लेकिन 18 दिनों के बाद ही 5 मार्च को ग्रीक पुलिस वहाँ चली आयी जहाँ वे रहते थे और पुलिस ने उन्हें गिरफ्तार कर अपने देश से निकाल दिया। ग्रीक मीडिया के अनुसार सरकार और चर्च के दबाव के कारण उन्हें ऐसा करना पड़ा था।

इसके बाद दो हफ्तों तक वे रोज यूरोप और अमेरिका के 17 देशो में घुमने की आज्ञा देने का निवेदन करते रहे। लेकिन इनमे से सभी देशो ने या तो उन्हें आज्ञा देने से मना कर दिया या तो किसी ने उनके आने पर जबर्दाती वीजा जब्त कर देने की धमकी दी। कुछ देशो ने तो उनके प्लेन को भी लैंड करने की आज्ञा नही दी थी।

मार्च-जून – 19 मार्च को वे उरुग्वे की यात्रा पर गये। 14 मार्च को सरकार ने एक प्रेस कांफ्रेंस में उनकी यात्रा के बारे में घोषणा की थी और उरुग्वे में उन्हें सरकार ने रहने की भी इजाजत दे दी थी। उरुग्वे के राष्ट्रपति सन्गुइनेत्ति ने बाद में बताया भी की उन्हें प्रेस कांफ्रेंस से पहले वाशिंगटन डी.सी. से एक कॉल आया था। जिसमे उन्हें कहा गया था की यदि ओशो को उरुग्वे में रहने दिया गया तो उन्होंने यूनाइटेड स्टेट से जो 6 बिलियन डॉलर का कर्जा लिया है वह तुरंत लौटाना होंगा और यूनाइटेड स्टेट उन्हें कभी कर्ज नही देंगा। यह सुनते ही 18 जून को ओशो ने उरुग्वे छोड़ दिया था।

जून-जुलाई – अगले महीने में वे जमैका और पुर्तगाल से वापिस आ गये। सभी 21 देशो ने उनके प्रवेश पर रोक लगा दी थी और देश में कदम रखते ही उन्हें वापिस लौट जाने को कहा जाता था। इसी वजह से 29 जुलाई 1986 को वे मुंबई, भारत वापिस आ गये।

1987-1989 – ओशो कम्यून इंटरनेशनल

जनवरी 1887 : वे भारत में पुणे के आश्रम में वापिस आए, जिसका नाम बाद में बदलकर रजनीशधाम रखा गया था।

जुलाई 1988 : ओशो ने 14 साल में पहली बाद हर शाम में प्रवचन खत्म करने के बाद स्वतः ध्यान लगाना शुरू किया। इस तरह उन्होंने ध्यान की तकनीक में एक क्रांतिकारी बदलाव लाया था और ध्यान लगाने की नयी तकनीको के बारे में वे लोगो को बताते थे।

जनवरी-फरवरी 1989 : भगवान के नाम का उपयोग करना छोड़ दिया था, अब उन्होंने अपना नाम केवल रजनीश ही रखा। जबकि उनके भक्त लोग उन्हें ओशो कहकर बुलाते थे, और रजनीश ने भी उनके इस नाम को स्वीकार किया था। ओशो ने बताया की उनके नाम की उत्पत्ति विलियम जेम्स के शब्द “ओशनिक” से हुई थी जिसका अर्थ समंदर में मिल जाने से है।

मार्च-जून 1989 – विषाक्तीकरण के प्रभाव से ठीक होने के लिए ओशो आराम कर रहे थे, इसका सबसे ज्यादा असे उनके स्वास्थ पर पड़ा था।

जुलाई 1989 : उनका स्वास्थ धीरे-धीरे ठीक हो रहा था और उनके दर्शन के लिए एक कार्यक्रम का भी आयोजन किया गया था, जिसमे मौन रखकर लोग उनका दर्शन लेते थे, इस कार्यक्रम को ओशो फुल मून फेस्टिवल का नाम भी दिया गया था।

अगस्त 1989 : ओशो रोज गौतम और बुद्ध के पेक्षागृह में दर्शन के लिए आटे थे। उन्होंने सफ़ेद कपड़ो के सन्यासियों का एक समूह भी बनाया था जिसे “ओशो के सफ़ेद कपडे पहने हुए भाई” का नाम दिया गया था। ओशो के सभी सन्यासी और असन्यासी उनके शाम के दर्शन के लिए आटे थे।

सितम्बर 1989 : ओशो ने अपना नाम रजनीश भी छोड़ दिया। अब वे सिर्फ ओशो के नाम से जाने जाते थे और उनके आश्रम का भी नाम बदलकर ओशो कम्यून इंटरनेशनल का नाम रखा गया था।

1990 ओशो को हुआ था मृत्युबोध

जनवरी 1990 : जनवरी के दुसरे सप्ताह में ओशो का शरीर पूरी तरह से कमजोर हो गया था। 18 जनवरी को, वे शारीरक रूप से बहुत कमजोर हो चुके थे, बल्कि वे गौतम और बुद्ध पेक्षागृह में आने में भी असमर्थ थे। 19 जनवरी को उनकी नाडी का धडकना भी कम हो गया था। और जब उनके डॉक्टर ने उनका गंभीर इलाज करने के लिए उनसे इजाजत मांगी तो उन्होंने मना कर दिया, और उन्हें जाने देने के लिए कहा। और कहाँ की प्रकृति ने मेरा समय निर्धारित कर रखा है।

शाम 5 PM बजे उन्होंने अपना शरीर छोड़ा था। 7 PM को उनके शरीर को गौतम और बुद्धा पेक्षागृह में लाया गया था और फिर अंतिम क्रिया करने के लिए घाट पर ले जाया गया था दो दिन बाद, उनकी अस्थियो को ओशो कम्यून इन्तेर्नतिओन में ले जाया गया और उनकी समाधी में उनकी अस्थियो को शिलालेख के साथ रखा गया था।

विश्वविख्यात दार्शनिक आचार्य रजनीश, जिन्हें पूरा संसार ओशो के नाम से जानता है। ओशो का जन्म कुचवाड़ा (रायसेन, मप्र) में हुआ, बचपन गाडरवारा में बीता और उच्च शिक्षा जबलपुर में हुई। ओशो के जीवन के कई अनछुए पहलू हैं, उन्होंने जीवन के रहस्यों को किशोरावस्था के दौरान गाडरवारा में ही जान लिया।

न हंसे और न रोए
परंपरा रही है कि पहला बच्चा नाना-नानी के घर पर होगा। ओशो का जन्म भी नाना के यहां कुचवाड़ा में हुआ। ओशो जब पैदा हुए तो तीन दिनों तक न तो रोए और न ही हंसे। ओशो के नाना-नानी इस बात को लेकर परेशान थे लेकिन तीन दिनों के बाद ओशो हंसे और रोए। नाना-नानी ने नवजात अवस्था में ही ओशो के चेहरे पर अद्‌भुत आभामण्डल देखा। अपनी किताब ‘स्वर्णिम बचपन की यादें’ में इस बात का उन्होंने जिक्र किया है।

ज्योतिषियों की भविष्यवाणी
ओशो के नाना ने बनारस के एक पंडित से उनकी कुण्डली बनवाई। पंडित द्वारा यह कहा गया कि जीवन के 21 वर्ष तक प्रत्येक सातवें वर्ष में इस बालक को मृत्यु का योग है। ओशो अपने नाना और नानी को सर्वाधिक चाहते थे और उन्हीं के पास अधिकांश समय रहा करते थे। उनके जीवन के सातवें वर्ष में ओशो के नाना बीमार हुए और बैलगाड़ी से इलाज के लिए ले जाते समय ओशो भी उनके साथ थे, तभी उनकी मृत्यु हो गई। ओशो ने इस समय मृत्यु को इतने करीब से देखा कि उन्हें स्वयं की मृत्यु जैसा महसूस हुआ। जब ओशो 14 वर्ष के हुए तो उन्हें मालूम था कि पंडित ने कुण्डली में मृत्यु का उल्लेख किया हुआ है। इसी को ध्यान में रखकर ओशो शक्कर नदी के पास स्थित एक पुराने शिव मंदिर में चले गए और सात दिनों तक वहां लेटकर मृत्यु का इंतजार करते रहे। सातवें दिन वहां एक सर्प आया, तो ओशो को लगा कि यही उनकी मृत्यु है लेकिन सर्प चला गया। इस घटना ने ओशो का मृत्यु से साक्षात्कार कराया और उन्हें मृत्युबोध हुआ।
ओशो आश्रम स्थली

बन गया ओशोलीला आश्रम
जहां ओशो ने अपने बाल्यकाल की क्रीड़ाएं खेलीं और जहां उन्हें मृत्युबोध हुआ था, उसी स्थान पर ओशो लीला आश्रम का निर्माण किया गया है, जहां हमेशा ध्यान शिविरों का संचालन किया जाता है। इसके संचालक स्वामी राजीव जैन बताते हैं कि हमारा प्रयास ओशो की धरोहरों और उनकी यादों को सहेजने का मात्र है जिससे आज उन्हें करीब से महसूस करने का मौका लोगों को मिल सके।

मृत्युबोध वाला प्राचीन मंदिर
संबोधि दिवस पर इसका जिक्र शायद सबसे महत्वपूर्ण है। गाडरवारा की शक्कर नदी के किनारे गर्राघाट पर एक पुराना मंदिर था। इसी के पास ओशो घंटों बैठकर ध्यान में डूबे रहते थे। यहीं पास में एक मग्गा बाबा रहा करते थे जिनसे ओशो को अत्यंत लगाव था। इन्हीं मग्गा बाबा का जिक्र ओशो ने अपनी किताबों में भी किया हुआ है। इसी मंदिर के पास उन्हें मृत्युबोध हुआ था और वे जीवन के रहस्यों को समझने लगे थे। यही वो क्षण था जब ओशो के जीवन में क्रांतिकारी परिवर्तन हुआ।

ओशो वाणी
* प्रेम परमात्मा को जन्म देने की कीमिया है।
* जन्म ही नहीं मृत्यु का भी उत्सव मनाओ।
* मैं धर्म नहीं धार्मिकता सिखाता हूं।
* यहां से गुजरा सोचा सलाम करता चलूं।
* सत्य का एकमात्र द्वार है भीतर की ओर खुलता है, एक बार खुल जाए तो निरंतर साथ रहता है, सत्य का और कोई द्वार होता ही नहीं। * सबसे बडा रोग क्या कहेंगे लोग।