प्रेम निर्दोष होता है जब यह और कुछ नहीं बस ऊर्जा का बांटना होता है। तुम्हारे पास बहुत अधिक है, इसलिए तुम बांटते हो… तुम बांटना चाहते हो।

और जिसके साथ भी तुम बांटते हो, तुम उसके प्रति अनुग्रह महसूस करते हो, क्योंकि तुम बादल की तरह थे–बरसात की पानी से बहुत भरे हुए–और किसी ने तुम्हें हल्का होने में मदद की। या तुम फूल जैसे थे, खुशबू से भरे हुए, और हवा आकर तुम्हें हल्का कर देती है। या तुम्हारे पास गाने के लिए गीत है और किसी ने ध्यानपूर्वक सुना…इतना ध्यानपूर्वक कि तुम्हें गाने का अवसर दिया। इसलिए जो कोई भी तुम्हें प्रेम में बहने में मदद करता है, उसके प्रति अनुग्रहित रहो।

बांटने की उस भावना को आत्मसात करो, उसे अपनी पूरी जीवन शैली बन जाने दो : कुछ पाने के विचार किये बिना देने की क्षमता का, बेशर्त देने की क्षमता का, अपने प्रचुरता से भरे होने की भावना से देने की क्षमता का।

Osho, The 99 Names of Nothingness, Talk #8