मेरा मार्ग हृदय का मार्ग बताया जाता रहा है, लेकिन यह सत्य नहीं है। हृदय तुम्हें सभी तरह की कल्पनाएं, भ्रम, छल, मधुर सपने देगा–लेकिन यह तुम्हें सत्य नहीं दे सकता। सत्य दोनों के पार है; यह तुम्हारी चेतना में है, जो कि न तो मन है न ही हृदय। बस चूंकि चेतना दोनों से अलग है, यह दोनों का लयबद्ध उपयोग कर सकती है। कुछ क्षेत्रों में मन खतरनाक है, क्योंकि इसके आंखें हैं पर पैर नहीं–यह अपाहिज है।

हृदय कुछ आयामों में कार्य कर सकता है। इसके पास आंखें नहीं हैं पर पैर हैं ; यह अंधा है लेकिन यह त्वरा से चल सकता है, बहुत तेज गति के साथ–निश्चित ही, यह जाने बिना कि कहां जा रहा है। यह संयोग मात्र ही नहीं है कि दुनिया की सभी भाषाओं में प्रेम को अंधा कहा जाता है। यह प्रेम नहीं है जो अंधा है, यह हृदय है जिसके पास आंखें नहीं हैं।
जैसे-जैसे तुम्हारा ध्यान गहरा होता है, जैसे-जैसे तुम्हारा हृदय और मन से तादात्म्य टूटने लगता है, तुम पाते हो कि तुम त्रिकोण बनने लगते हो। और तुम्हारी वास्तविकता तीसरी शक्ति में है : चेतना में। चेतना आसानी से सम्हाल सकती है क्योंकि हृदय और मन दोनों इसके हिस्से हैं।
Osho, From the False to the Truth, Talk #31