एक कहानी मैंने पढ़ी, तो मैं हैरान हुआ। उसमें कहा गया था : यह कोई अमीर का महल नहीं है जिसमें जगह न हो। यह गरीब का झोपड़ा है, इसमें खूब जगह है। जगह महलों में और झोपड़ों में नहीं होती, जगह हृदयों में होती है। अक्सर तुम पाओगे, गरीब कंजूस नहीं होता। कंजूस होने योग्य उसके पास कुछ है ही नहीं। पकड़े तो पकड़े क्या? जैसे—जैसे आदमी अमीर होता है, वैसे कंजूस होने लगता है; क्योंकि जैसे—जैसे पकड़ने को होता है, वैसे—वैसे पकड़ने का मोह बढ़ता है, लोभ बढ़ता है। निन्यानबे का चक्कर पैदा हो जाता है। जिसके पास निन्यानबे रुपए हैं, उसका मन होता है कि किसी तरह सौ हो जाएं। तुम उससे एक रुपया मांगो, वह न दे सकेगा, क्योंकि एक गया तो अट्ठानबे हो जाएंगे। अभी सौ की आशा बांध रहा था, अब हुए पूरे, अब हुए पूरे। नहीं दे पाएगा। लेकिन जिसके पास एक ही रुपया है, वह दे सकता है। क्योंकि सौ तो कभी होने नहीं हैं। यह चला ही जाएगा रुपया।


तुमने भी अपने मन में यह तर्क कई बार पाया होगा। लोगों के पास एक रुपए का फुटकर नोट होता है; जल्दी चला जाता है। सौ रुपए का नोट होता है तो वह तोड़ता ही नहीं। वह कहता है तोड़ना ठीक नहीं, क्योंकि टूटा कि गया। सौ पर पकड़ ज्यादा हो जाती है। हजार का हो, तो और पकड़ ज्यादा हो जाती है कि कहीं टूट न जाए। टूटा कि गया। जितना कम है उतनी पकड़ भी कम होती है। और चला तो जाएगा ही। अभी नहीं तो थोड़ी देर में चला जाएगा। पकड़ने का अर्थ भी क्या है?
तो ऐसा नहीं कि गरीबों ने दान नहीं किया। सच तो यह है, गरीबों ने महत दान किया। मगर उनका दान लेखे—जोखे में नहीं आता। उनके दान को लेखे—जोखे में लाने का तराजू नहीं है। उन्होंने प्रेम दिया, धन नहीं था। धन तो था ही नहीं, देते क्या? उन्होंने प्रेम दिया। महल तो थे नहीं, हाथी—घोड़े, हीरे—जवाहरात तो थे नहीं; लेकिन जो था, अपना जीवन था, वह दिया। अपना प्रेम दिया। अपनी सहानुभूति दी। अपनी करुणा दी। मगर उसको तो कैसे नापो? किस तराजू पर नापो?
इसलिए धनियों का दान तो खूब चर्चा की जाती है! धनी दानशाली हो जाते हैं, दाता हो जाते हैं। गरीब का कोई हिसाब नहीं लगाया जाता।

धन से दान को मत जोड़ना। दान को धन से मत जोड़ना। दान बहुत बड़ी बात है। दान की उस बहुत बड़ी घटना में धन का दान भी एक हिस्सा मात्र है; और बहुत छोटा, क्षुद्र हिस्सा! कोई बहुत बड़ा हिस्सा नहीं है; साधारण, अतिसाधारण। उसमें असली हिस्से तो और हैं—आत्मा के हैं, प्रेम के हैं, ज्ञान के हैं, बोध के हैं।
अब देखो मजा, महावीर ने महल छोड़ा, धन—दौलत छोड़ी; उसका शास्त्रों में खूब वर्णन है। और फिर जीवन—भर उन्होंने प्रेम बांटा, ज्ञान बांटा, ध्यान बांटा; उसका कोई वर्णन नहीं है। उसको कोई दान मानता ही नहीं। मैं चौंकता हूं कभी यह देखकर कि शास्त्र लिखने वाले भी कैसे अंधे लोग होते हैं! फिर कोई यह नहीं कहता कि महावीर ने कितना ध्यान बांटा! कितने लोगों के ध्यान के दीए जलाए! ऐसे ही थोड़ी जल जाते हैं ध्यान के दीए। महावीर की ज्योति छलांग लेती, तब किसी बुझे दीए में ज्योति आती है। महावीर अपने प्राणों को डालते जाते हैं। कितने लोगों में उन्होंने अपने प्राण डाले! कितने लोगों की श्वासें सुगंधित हो गईं! कितने लोगों के जीवन में शांति आई!
नहीं, इसका कोई हिसाब नहीं है। वह जो कंकड़—पत्थर बांटकर निकल गए थे महल से…। वह महल भी उनका नहीं था। वे कंकड़—पत्थर भी उनके नहीं थे। वे छूट ही जाने थे। आज नहीं कल मौत आती और सब छीन लेती। उसका हिसाब लगाया गया है!
लेकिन महावीर ने कितने लोगों को ध्यान दिया! कितने लोगों को प्रेम दिया! लोगों को ही नहीं—फकीर के गधे को याद रखना—महावीर ने कीड़े—मकोड़ों को भी उतना ही प्रेम दिया जितना मनुष्यों को। इसलिए पैर भी फूंक—फूंककर रखने लगे कि किसी को चोट न लग जाए! रात महावीर करवट नहीं बदलते थे, क्योंकि करवट बदलें और कोई रात कीड़ा—मकोड़ा आ गया हो पीठ के पीछे, विश्राम कर रहा हो, दब जाए, मर जाए। तो एक ही करवट सोते थे। यह दान चल रहा है! अब हीरे—जवाहरात तो नहीं हैं बांटने को, अब असली हीरे—जवाहरात बांटे जा रहे हैं। मगर हमारे तथाकथित शास्त्र लिखने वाले को असली हीरे—जवाहरातों का तो कोई पता नहीं है।
कबीर के पास महल तो नहीं था छोड़ने को, था ही नहीं। इसलिए कबीर तीर्थंकर बनने से वंचित रह गए। इसलिए कबीर अवतार न बन सके। इसलिए कबीर पैगंबर न बन सके। इसलिए कबीर चूक गए। और कबीर ने जो बांटा, कबीर ने जीवन—भर जो बांटा—जो मस्ती बांटी, जो आनंद बांटा, जो रस बांटा! कबीर ने न मालूम कितने लोगों के जीवन में फूल बरसाए। उस सबका हिसाब कौन करेगा?
तो मैं तुम्हारे मन से यह भ्रांति तोड़ देना चाहता हूं कि धन और दान एकार्थी हैं। दान बहुत बड़ी घटना है। धन का दान उस बड़ी घटना में एक छोटा—सा पहलू है, बहुत छोटा—सा पहलू। असली बात है प्रेम। दान और प्रेम पर्यायवाची हैं, दान और धन पर्यायवाची नहीं हैं।
कहै वाजिद पुकार👣ओशो