नया मनुष्य

आनंदित हों कि पुराना मर रहा है… नया मनुष्य कोई युद्धक्षेत्र नहीं है, विभाजित व्यक्तित्व नहीं है बल्कि एक अविभाज्य मानव की प्रतिमा है, अद्वितीय, जीवन के साथ समग्रता से सहक्रियाशील। नया मनुष्य मूर्तरूप है अधिक सक्षम, रूपांतरित व्यक्तित्व का, ब्रह्मांड में नये ढंग से होने का, सत्य को एक गुणात्मक भेद से देखने और अनुभव करने का। तो कृपा करें और अतीत के बीत जाने का शोक न मनाएं। आनंदित हों कि पुराना मर रहा है, रात्रि विदा हो रही है और क्षितिज पर पौ फटने लगी है। Read More

भगवत्ता

भगवत्ता एक सत्य है; भगवान एक कल्पना। भगवत्ता एक अनुभव है; भगवान, एक प्रतीक, एक प्रतिमा। जैसे तुमने भारत माता की तस्वीरें देखी हों। कोई चाहे तो प्रेम की तस्वीर बना ले। लोगों ने प्रभात की तस्वीरें बनाई हैं, रात्रि की तस्वीरें बनाई हैं। प्रकृति को भी रूपायित करने की चेष्टा की है। काव्य की तरह वह सब ठीक, लेकिन सत्य की तरह उसका कोई मूल्य नहीं। Read More

मंत्र: मन का खेल

मंत्र तो मन का ही खेल है। मंत्र शब्द का भी यही अर्थ है: मन का जाल, मन का फैलाव। मंत्र से मुक्त होना है, क्योंकि मन से मुक्त होना है। मन न रहेगा तो मंत्र को सम्हालोगे कहां? और अगर मंत्र को सम्हालना है तो मन को बचाये रखना होगा। Read More

साक्षी: समस्त धर्म-अनुभव की एकमात्र वैज्ञानिक आधारशिला

वैज्ञानिक युग में धर्म का स्थान

मनुष्य का स्वर्णिम भविष्य: एक महान चुनौती

यह छोटी सी किताब निःसंकोच रूप से इस आतंकित ग्रह के बुद्धिमान लोगों को संबोधित की गई है। यह एक व्यक्ति की दृष्टि है – व्यवहार्य मानवता के लिए। यह उन मानसिक तथा सामाजिक बीमारियों के बारे में एक व्यक्ति का निदान है, जो भीतर से और बाहर से मनुष्य के दो टुकड़े कर उन्हें आपस में लड़ाती रहती है। Read More

क्या पूरब पश्चिम एक होँगे?

मनुष्य के पूरे अतीत ने मनुष्य में एक विभाजन पैदा कर दिया है, हर आदमी के भीतर निरंतर एक शीत युद्ध चल रहा है। यदि तुम्हें बेचैनी का अनुभव होता है, तो उसका कारण व्यक्तिगत नहीं है। तुम्हारी बीमारी सामाजिक है। और जिस चालाकी से भरी तरकीब का उपयोग किया गया है, वह है: तुम्हें दुश्मनों के दो खेमों में बांटना-भौतिकवादी और अध्यात्मवादी, जोरबा और बुद्ध। Read More

बेशर्त प्रेम

प्रेम, संबंध नहीं है

साधक और सदगुरु

ईश्वर बनाम अस्तित्व

कोई भी मेरे ऊपर निर्भर नहीं है

क्या दुनिया अधिक पागल होती जा रही है?

क्या मनुष्य को धर्म की आवश्यकता है?

धर्मों ने तुम्हें तुम्हारी स्वाभाविक इच्छाओं और प्रवृत्तियों के विरोध में क्यों रखा? कारण सीधा-साफ है-तुम्हें अपराध-भाव महसूस कराने के लिए। इस शब्द को मैं दोहराना चाहता हूं-“अपराध-भाव।’ यह उनका खास मुद्दा रहा है, केंद्र-बिंदु रहा है तुम्हें मिटाने में, तुम्हारे शोषण में, तुम्हें उनकी इच्छानुसार ढालने में, तुम्हें निकृष्ट सिद्ध करने में, और तुम्हारा आत्म-सम्मान नष्ट करने में।

विद्रोह क्या है?

सभी धर्म कामवासना के विरोध में क्यों हैं?

भविष्य की सभ्यता स्त्री के आसपास बनेगी

नीति और धर्म दो विपरीत दिशाएं’

समाज को आपसे, आपकी निपट निजता में कोई प्रयोजन नहीं है। उस दृष्टि से आप न भी हो तो भी समाज को कोई अर्थ नहीं है। समाज के लिए आप उसी क्षण महत्वपूर्ण हैं, जब आप किसी से संबंधित होते हैं। समाज को आप नहीं, आपका व्यवहार ही मूल्यवान है। आप नहीं, आपका आचरण ही अर्थपूर्ण है। इसलिए समाज की शिक्षा सदाचरण की है तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। मनुष्य उसके लिए आचरण से ज्यादा नहीं है।