ओशो रजनीश (११ दिसम्बर १९३१ – १९ जनवरी १९९०) का जन्म भारत के मध्य प्रदेश राज्य के रायसेन शहर के कुच्वाडा गांव में हुआ था ओशो शब्द लैटिन भाषा के शब्द ओशोनिक से लिया गया है, जिसका अर्थ है सागर में विलीन हो जाना। १९६० के दशक में वे ‘आचार्य रजनीश’ के नाम से एवं १९७० -८० के दशक में भगवान श्री रजनीश नाम से और ओशो १९८९ के समय से जाने गये। वे एक आध्यात्मिक गुरु थे, तथा भारत व विदेशों में जाकर उन्होने प्रवचन दिये।

ओशो कहते हैं कि –

“धार्मिक व्यक्ति की पुरानी धारणा यह रही है कि वह जीवन विरोधी है। वह इस जीवन की निंदा करता है, इस साधारण जीवन की – वह इसे क्षुद्र, तुच्छ, माया कहता है। वह इसका तिरस्कार करता है। मैं यहाँ हूँ, जीवन के प्रति तुम्हारी संवेदना व प्रेम को जगाने के लिये।”

19 January 1990, Pune

ध्यान करो, क्योंकि यह क्षण तुम्हारे लिए महत्व का होगा। जब कोई मरता है, कोई जिससे तुम गहराई से सम्बंधित रहे हो, कोई जिसके तुम बहुत निकट रहे हो, कोई जिसके साथ तुम सुखी और दुखी रहे हो, उदास और क्रोधित, कोई जिसके साथ तुमने जीवन की समस्त ऋतुएं जानी हैं और कोई जो एक प्रकार से तुम्हारा अंग बन गया है और तुम उसका अंग बन गए हो; जब ऐसा कोई मरता है, यह मात्र एक बाहर की मृत्यु नहीं है, यह एक मृत्यु है जो भीतर भी घटती है। वह तुम्हारी चेतना का एक अंश थी तो जब वह मरती है, तुम्हारे भीतर का वह अंश भी मरता है। वह तुम्हारे भीतर कुछ पूर्ति कर रही थी। वह लुप्त हो गयी और घाव रह गए।

हमारी चेतना में कई छिद्र हैं। उन छिद्रों के कारण हम दूसरों का साथ खोजते हैं, दूसरों का प्रेम। दूसरे की उपस्थिति से हम किसी प्रकार से उन छिद्रों को भरने में समर्थ हो पाते हैं। जब दूसरा लुप्त हो जाता है, वे छिद्र फिर से वहां होते हैं… खुलते हुए विशाल खड्ड। तुम उनके बारे में भूल गए होंगे, मगर तुम उन्हें महसूस करोगे और उनकी पीड़ा। तो इन क्षणों का उपयोग गहरे ध्यान के लिए करो क्योंकि देर अबेर वे छिद्र फिर से भर जायेंगे। वे छिद्र फिर से लुप्त हो जायेंगे। इसके पहले की ऐसा हो यह अच्छा है की इन छिद्रों में प्रवेश किया जाये, उस रिक्तता में प्रवेश किया जाये जो वह अपने पीछे छोड़ जाएगी। तो इन क्षणों का उपयोग करो। चुप चाप बैठ जाओ, आँखें बंद कर लो, भीतर चले जाओ। और देखो क्या घटा है। भविष्य के सम्बन्ध में विचार मत करो, अतीत के सम्बन्ध में मत सोचो। स्म्रतियों में मत जाओ क्योंकि वह व्यर्थ है। बस भीतर चले जाओ। तुम्हें क्या हो रहा है? उस प्रक्रिया में चले जाओ। वह तुम्हें बहुत सी बातें प्रकट करेगा। यदि तुम उन छिद्रों को भेद देते हो तुम पूर्णतया रूपांतरित हो जाओगे। तुम उनको फिर से भरने का प्रयास नहीं करोगे, मगर फिर भी तुम प्रेम कर सकते हो।

कोई प्रेम कर सकता है बिना किसी को भीतर लिए हुए और वहां पर कोई गहरी आवश्यकता को पूर्ण करे बिना। कोई ऐश्वर्य के रूप में प्रेम कर सकता…. क्योंकि किसी के पास बांटने को है और कोई बांटना चाहता है। फिर प्रेम कोई आवश्यकता नहीं है; तुम अपने घाव उसके पीछे नहीं छिपा रहे हो।

तो इन घावों में जाओ, इस रिक्तता में जाओ, इस अनुपस्थिति में जाओ और देखो; यह पहली बात है।

दूसरी बात: याद रखो जीवन वास्तव में तैरता हुआ है, फिसलता हुआ… इसीलिए क्षणभंगुर। हम एक चमत्कारिक जगत में रहते हैं। हम अपने को धोका दिए जाते हैं। बार बार भ्रम टूटता है। पुनः वास्तविकता विस्फोटित होती है। फिर फिर कोई मरता है और तुम स्मरण दिलाये जाते हो की जीवन भरोसे योग्य नहीं है, की किसी को जीवन पर बहुत निर्भर नहीं रहना चाहिए। एक क्षण वह है, दूसरे क्षण वह जा चुका है। वह एक साबुन का बुलबुला है; छोटी से चुभन और वह गया। वास्तव में जितना तुम जीवन को समझते हो उतना तुम आश्चर्य से भरते हो की वह कैसे अस्तित्व में है! तब मृत्यु समस्या नहीं है; जीवन समस्या बन जाता है! मृत्यु स्वाभाविक लगती है।

यह एक चमत्कार है की जीवन अस्तित्व में है; इतनी कामचलाऊ चीज़, इतनी क्षणिक चीज। और मात्र यह अस्तित्व में ही नहीं है, लोग इस पर श्रद्धा करते हैं। लोग इस पर निर्भर रहते हैं, लोग इस पर भरोसा करते हैं। वे अपनी पूरी आत्मा इसके चरणों में रख देते हैं; और यह मात्र एक भ्रम है, एक स्वप्न है। किसी भी क्षण यह चला गया है और कोई रोता हुआ पीछे छूट गया है। उसके साथ सारा प्रयास चला गया है, वह सारा बलिदान जो उसके लिए किया था। अचानक सब कुछ लुप्त हो जाता है। तो इसको देखो; इस क्षणिक, स्वप्नवत्, भ्रामक जीवन को देखो!

और मृत्यु सब को आ रही है। हम सब कतार में खड़े हैं, और वह कतार लगातार मृत्यु के निकट आ रही है। वह चली गयी; कतार थोड़ी कम हुई। उसने और एक आदमी की जगह बना दी है। हर एक मरता हुआ व्यक्ति तुम्हें अपनी मृत्यु के निकट ला रहा है, तो हर मृत्यु आधारभूत रूप से तुम्हारी मृत्यु है। हर मृत्यु में कोई मर रहा है और पूर्ण विराम के निकट आ रहा है। इसके पहले यह घटे, व्यक्ति को जितना होश पूर्ण हो सके हो सके, बनना है।

यदि हम जीवन पर बहुत श्रद्धा करते हैं, हम अचेतन होने की ओर प्रवृत्त हैं। यदि हम जीवन पर संदेह करते हैं; इस तथाकथित जीवन पर संदेह जो हमेशा मृत्यु पर समाप्त होता है; तब हम अधिक होश पूर्ण होते हैं। और उस बोध में एक नए प्रकार का जीवन प्रारंभ होता है, उसके द्वार खुलते हैं; वह जीवन जो मृत्यु विहीन हैं, जीवन जो शाश्वत है, जीवन जो समय के पार है।