नव संन्यास : वर्ष 1970 में मनाली के एक ध्यान शिविर में, ‘श्रीकृष्ण मेरी दृष्टि में’ प्रवचनमाला के साथ-साथ ओशो के ‘नव-संन्यास’ आंदोलन का सूत्रपात हुआ। इस दौरान उन्होंने दुनियाभर के धर्मों में प्रचलित संन्यास से भिन्न एक नए तरह का संन्यासी होने का कॉन्सेप्ट रखा।
ओशो ने एक हंसते-खेलते अभिनव संन्यास की प्रस्तावना की। इस संन्यास में कोई त्याग और पलायन नहीं है, बल्कि ध्यान द्वारा स्वयं को रूपांतरित करके जीवन को और सुंदर व सृजनात्मक बनाने की भावना है। संसार में रहते हुए संसार का न होना, कमलवत जीना, अतीत की स्मृतियों और भविष्य की कल्पनाओं से निर्भय होकर क्षण-क्षण होश में जीना ओशो का नव-संन्यास है।

इस नव-संन्यास में संन्यासी को कोई भगवा या गेरुए वस्त्र पहनने की जरूरत नहीं। माला और नियमों का पालन करने की जरूरत नहीं। पूजा-पाठ, ईश्वर-प्रार्थना आदि करने की जरूरत नहीं। बस प्रतिदिन ध्यान करने की शर्त है। ओशो की नजर में संन्यासी वह है, जो अपने घर-संसार, पत्नी और बच्चों के साथ रहकर पारिवारिक, सामाजिक जिम्मेदारियों को निभाते हुए ध्यान और सत्संग का जीवन जिए। उनकी दृष्टि में यह एक संन्यास है, जो इस देश में हजारों वर्षों से प्रचलित है।

ओशो कहते हैं कि आपने घर-परिवार छोड़ दिया, भगवे वस्त्र पहन लिए, चल पड़े जंगल की ओर। वह संन्यास तो त्याग का दूसरा नाम है, वह जीवन से भगोड़ापन है, पलायन है। और एक अर्थ में आसान भी है- अब है कि नहीं, लेकिन कभी अवश्य आसान था। वह संन्यास इसलिए भी आसान था कि आप संसार से भाग खड़े हुए तो संसार की सब समस्याओं से मुक्त हो गए, क्योंकि समस्याओं से कौन मुक्त नहीं होना चाहता? लेकिन जो लोग संसार से भागने की अथवा संसार को त्यागने की हिम्मत न जुटा सके, मोह में बंधे रहे, उन्हें त्याग का यह कृत्य बहुत महान लगने लगा।

‘जीवन को आत्म-अज्ञान के बिंदु से देखना संसार है; आत्म-ज्ञान के बिंदु से देखना संन्यास है। इसलिए जब कोई कहता है कि मैंने संन्यास लिया है, तो मुझे बात बड़ी असत्य मालूम होती है। यह लिया हुआ संन्यास ही संसार के विरोध की भ्रांति पैदा कर देता है। संन्यास भी क्या लिया जा सकता है? क्या कोई कहेगा कि ज्ञान मैंने लिया है? लिया हुआ ज्ञान भी क्या कोई ज्ञान होगा?

ऐसा ही लिया हुआ संन्यास भी, संन्यास नहीं होता है। सत्य ओढ़े नहीं जाते हैं। उन्हें तुम्हारे भीतर जगाना होता है। संन्यास का जन्म होता है। वह समझ से आता है। उस समझ से हम परिवर्तित होते जाते हैं। जैसे-जैसे हमारी समझ बदलती है, हमारी दृष्टि बदलती है और अनायास ही आचरण भी बदल जाता है। संसार जहां का तहां होता है, पर हमारे भीतर संन्यास का जन्म होता जाता है।

संन्यास का अर्थ है : यह बोध कि मैं शरीर ही नहीं हूं, आत्मा हूं। इस बोध के साथ ही भीतर आसक्ति और अज्ञान नहीं रह जाता है। संसार बाहर था, अब भी वह बाहर होगा, पर भीतर उसके प्रति राग-शून्यता होगी, या यूं कहें कि संसार अब भीतर नहीं होगा।’ -ओशो, साधना पथ,