संभोग से समाधि की ओर : ‘संभोग से समाधि की ओर’ उनकी बहु‍चर्चित पुस्तक है, लेकिन इससे कहीं ज्यादा अधिक सेक्स के संबंध में अन्य दूसरी पुस्तकों में उन्होंने सेक्स को एक अनिवार्य और नैसर्गिक कृत्य बताकर इसका समर्थन किया है। जबकि आमतौर पर दुनियाभर के धर्म सेक्स का विरोध करते हैं। संन्यास लेना हो या किसी भी संप्रदाय का संत बनना हो तो पहली शर्त ही यह है कि ब्रह्मचर्य का पालन करें, लेकिन ओशो के संन्यास की शुरुआत ही भोग से तृप्त होकर मुक्त होने के बाद होती है।

ओशो के सेक्स संबंधी विचारों का विश्वभर के लोगों ने उनके काल में घोर विरोध किया था और आज भी करते हैं। ओशो कहते हैं कि सेक्स पहली सीढ़ी है और समाधि अंतिम। संभोग से समाधि की ओर, युवक और योनि व क्रांतिसूत्र, तंत्र सूत्र, विज्ञान भैरव तंत्र आदि कई किताबों के माध्यम से ओशो ने सेक्स, युवक, विद्रोह, प्रेम विवाह, तलाक आदि पर अपने बेबाक विचार रखे।

वे कहते हैं कि यदि विवाह करना हो तो उसमें कई तरह की कानूनी बाधा खड़ी करो और तलाक के लिए कानून आसान बनाए। अभी इसका ठीक उल्टा है। विवाह करना आसान है लेकिन तलाक लेना कठिन।

क्रांतिसूत्र में ओशो ने किसी भी तरह के वाद, पब्लिक ओपिनियन और दमन से मुक्ति की जोरदार वकालत की है तो दूसरी ओर ओशो अपोजिट सेक्स के बच्चों को ज्यादा-से-ज्यादा नग्न रखने की सलाह देते हैं, तो कहीं हर नगर में खजुराहो जैसी नग्न प्रतिमाओं के होने की वकालत करते हैं।

सेक्स संबंधी कुछ विचार :
* ‘संभोग से समाधि की ओर’ में ओशो कहते हैं कि सेक्स का विरोध नहीं है ब्रह्मचर्य, बल्कि सेक्स का ट्रांसफॉर्मेशन है। जो सेक्स का दुश्मन है, वह कभी ब्रह्मचर्य को उपलब्ध नहीं हो सकता।

* जिस दिन इस देश में सेक्स की सहज स्वीकृति हो जाएगी, उस दिन इतनी बड़ी ऊर्जा मुक्त होगी भारत में कि हम आइंस्टीन पैदा कर सकते हैं।

* पति अपनी पत्नी के पास ऐसे जाए, जैसे कोई मंदिर के पास जाता है। पत्नी अपने पति के पास ऐसे जाए, जैसे कोई परमात्मा के पास जाता है, क्योंकि जब दो प्रेमी संभोग करते हैं, तो वास्तव में वे परमात्मा के मंदिर से ही गुजरते हैं।

* संभोग का इतना आकर्षण क्षणिक समाधि के लिए है। संभोग से आप उस दिन मुक्त होंगे जिस दिन आपको समाधि बिना संभोग के हासिल होनी शुरू हो जाएगी।

*परिवार नियोजन की बात धीरे-धीरे अनिवार्य हो जानी चाहिए। इसे किसी की स्वेच्छा पर नहीं छोड़ा जा सकता।

विश्‍वास नहीं, संदेह करो : ओशो कहते हैं कि धर्म या विज्ञान के रेडीमेड सत्यों से काम नहीं चलेगा। मैं संशय (दुविधा) की बात नहीं कर रहा हूं। मैं संदेह की बात कर रहा हूं। संदेह करोगे तभी सत्य तक पहुंच सकते हो। श्रद्धा और विश्वास बांधते हैं, संदेह मुक्त करता है।
दुनियाभर के धर्म तुम्हें विश्वास करना सिखाते हैं। यह धर्मों की चालाकियां हैं। सभी तरह की शिक्षा चित्त को बूढ़ा करती है। यह चित्त को जगाती नहीं, भरती है और भरने से चित्त बूढ़ा होता है। विचार भरने से चित्त थकता, बोझिल होता और बूढ़ा होता है! विचार देना, स्मृति को भरना है। वह विचार या विवेक का जागरण नहीं है। स्मृति विवेक नहीं है। स्मृति तो यांत्रिक है। विवेक है चैतन्य। विचार नहीं देना है, विचार को जगाना है। विचार जहां जागृत है, वहां चित्त सदा युवा है। और जहां चित्त युवा है, वहां जीवन का सतत संघर्ष है, वहां चेतन के द्वार खुले हैं और वहां सुबह की ताजी हवाएं भी आती हैं और नए उगते सूरज का प्रकाश भी आता है। व्यक्ति जब दूसरों के विचारों और शब्दों की कैद में हो जाता है, तो सत्य के आकाश में उसकी स्वयं की उड़ने की क्षमता ही नष्ट हो जाती है।

दुनिया के सारे धर्म इस चित्त पर ही कब्जा करना चाहते हैं इसलिए उन्होंने तरह-तरह के नियम, क्रिया-कांड, ग्रह-नक्षत्र, किताब और ईश्वर के प्रति भय को उत्पन्न कर लोगों को अपने-अपने धर्म से जकड़े रखा है। दुनिया के तमाम धर्म ‘विश्वास’ सिखाते हैं, लेकिन वे जो विश्वास सिखाते हैं उस पर कभी कोई सवाल नहीं उठाता। धर्मों के विश्वास और धारणाओं पर सभी आंखें बंद करके मानते रहते हैं। यदि कोई इस पर सवाल उठाता भी है तो उसे धर्म-विरोधी या नास्तिक मान लिया जाता है। ईशनिंदा का खतरा पैदा हो जाता है।

ओशो अपनी पुस्तक शिक्षा में क्रांति और एक-एक कदम, क्रांति के बीज आदि तमाम किताबों में दर्ज प्रवचनों के माध्यम से संदेह और विचार को जाग्रत करने की बात करते हैं। वे कहते हैं कि किसी बात को मानना नहीं, जानना चाहिए। विचारवान लोग ही जानने के बारे में सोचते हैं। विश्‍वास से अंधश्रद्धा का जन्म होता है।

‘मानने के धोखे में मत पड़ना। जानने की यात्रा करो। जानो तो निश्चित देव ही है, पत्थर तो है ही नहीं। मूर्तियों में ही नहीं, पहाड़ों में भी जो पत्थर है वहां भी देवता ही छिपा है। जानने से तो परमात्मा के अतिरिक्त और कुछ बचता ही नहीं है। जाना कि परमात्मा के द्वार खुले- हर तरफ से, हर दिशा से, हर आयाम से। कंकड़-कंकड़ में वही है। तृण-तृण में वही है। पल-पल में वही है। लेकिन जानने से। विश्वास से शुरू मत करना; बोध से शुरू करो। विश्वास तो आत्मघात है। अगर मान ही लिया तो खोजोगे कैसे? और तुम्हारे मानने में सत्य कैसे हो सकता है? एक क्षण पहले तक तुम्हें पत्थर दिखाई पड़ता था, और अब तुमने मान लिया और देवता देखने लगे। यह देखने लगे चेष्टा करके, लेकिन भीतर किसी गहराई में तो तुम अब भी जानोगे न कि पत्थर है! उस भीतर की गहराई को कैसे बदलोगे? संदेह तो कहीं न कहीं छिपा ही रहेगा, बना ही रहेगा। इतना ही होगा कि ऊपर-ऊपर विश्वास हो जाएगा; संदेह गहरे में सरक जाएगा। यह तो और खतरा हो गया। संदेह ऊपर-ऊपर रहता, इतना हानिकर नहीं था। यह तो संदेह और भीतर चला गया, और प्राणों के रग-रेशे में समा गया। यह तो तुम्हारा अंतःकरण बन गया। यही तो हुआ है। दुनिया में इतने लोग हैं, करोड़ों-करोड़ों लोग मंदिर जाते, मस्जिद जाते, गुरुद्वारा जाते, चर्च जाते और इनके भीतर गहरा संदेह भरा है। ईसाई और हिन्दू और मुसलमान सब ऊपर-ऊपर हैं और भीतर संदेह की आग जल रही है। और वह संदेह ज्यादा सच्चा है, क्योंकि संदेह तुमने थोपा नहीं है। ज्यादा स्वाभाविक है। और तुम्हारा विश्वास थोपा हुआ है, आरोपित है। आरोपित विश्वास स्वाभाविक संदेह को कैसे मिटा सकेगा? आरोपित विश्वास तो नपुंसक है। स्वाभाविक संदेह अत्यंत ऊर्जावान है।’ -अजहूं चेत गंवार प्रवचन 6