बुद्ध से मौलुंकपुत्त के ग्यारह प्रश्न – ओशो

मौलुंकपुत्त नाम के एक युवक ने जाकर, बुद्ध से ग्यारह प्रश्न पूछे। उन ग्यारह प्रश्नों में जीवन के सारे प्रश्न आ जाते हैं। उन ग्यारह प्रश्नों में तत्व चिंतन जिन्हें सोचता है वे सारी समस्याएं आ जाती हैं। बहुत मीठा संवाद हआ। मौलंकपत्त ने अपने प्रश्न पूछे। बद्ध ने कहा, मेरी एक बात सनोगे? छह मही ने, साल भर रुक सकते हो ? साल भर प्रतीक्षा कर सकते हो? अच्छा हो कि साल भर मेरे पास रुक जाओ, साल भर बाद पूछ लेना, मैं तुम्हें उत्तर दे दूंगा। मौलुंकपु त्त ने कहा, अगर उत्तर आपको ज्ञात है तो अभी दे दें और अगर ज्ञात नहीं है तो स्पष्ट अपने अज्ञान को स्वीकार कर लें। मैं लौट जाऊं। साल भर आपको चिंतन कर ना होगा, तब आप उत्तर देंगे। बुद्ध ने कहा, इससे पहले भी यह प्रश्न तुमने किसी से पूछे थे? मौलुंकपुत्त ने कहाअनेक से, लेकिन उन सभी ने तत्काल उत्तर दे दिए थे। किसी ने यह नहीं कहा ि क इतने दिन रुक जाओ। बुद्ध ने कहा, अगर वे उत्तर उत्तर थे तो तुम अब भी उन ही प्रश्नों को क्यों पूछते चले जाते हो? अगर वे उत्तर वस्तुत: उत्तर बन गए होते तो अब तुम्हें दुबारा उन्हीं प्रश्नों को पूछने की जरूरत न रह जाती। इतना तो निशि चत है कि तुम फिर उन्हीं को पूछ रहे हो। जो उत्तर तुम्हें दिए गए, वे उत्तर साबित नहीं हुए। मैं भी तुम्हें तत्काल उत्तर दे सकता हूं, लेकिन वे उत्तर व्यर्थ हैं। असल में, किसी भी दूसरे से दिए गए उत्तर व्यर्थ होंगे। उत्तर तुममें पैदा होने चाहिए। इसलिए मैं कह रहा हूं कि वर्ष भर रुक जाओ।

बुद्ध का एक शिष्य था, आनंद। वह यह बात सुनकर हंसने लगा। उसने मौलुंकपुत्त से कहा कि तुम इनकी बातों में मत आना। मैं बीस वर्षों से इनके निकट हूं। अनेक लोग आए और उन अनेक लोगों ने उनके प्रश्न पूछे। बुद्ध सबसे यही कहते हैं, एक वर्ष रुक जाओ, दो वर्ष रुक जाओ। मैं प्रतीक्षा करता रहा। वर्ष भर बाद, दो वर्ष बाद, वह पूछेगे और हमें बुद्ध से उत्तर ज्ञात हो सकेंगे। लेकिन न मालूम क्या ह्येता है, वर्ष भर बाद, दो वर्ष बाद, लोग पूछते नहीं और आज तक पता नहीं चल पा या कि बुद्ध के उत्तर क्या हैं। इसलिए अगर पूछना हो तो अभी पूछ लो, नहीं तो वर्ष भर बाद तुम पूछोगे ही नहीं।। बुद्ध ने कहा-मैं अपने वचन पर दृढ़ रहूंगा। तुम पूछोगे तो उत्तर दूंगा। तुम पूछो ही न तो बात अलग है। मौलुंकपुत्त वर्ष भर रुका। वर्ष भर बाद बुद्ध ने कह, पूछते हो? वह हंसने लगा। वह बोला, अब पूछने की कोई जरूरत नहीं।

भारत की पूरी की पूरी जो पकड़ है, जो एप्रोच है सत्य के प्रति, वह बाहर से उत्त र उपलब्ध करने की नहीं, भीतर द्वार खोलने की है। उस द्वार के खुलने पर, प्रश्नों के पर्टिकुलर उत्तर मिलते हैं ऐसा नहीं, असल में प्रश्न गिर जात हैं। प्रश्नों का उत्त र मिलना एक बात है और प्रश्नों का गिर जाना, बिलकुल दूसरी भूमिका की बात है। उत्तर का मिलना महत्वपूर्ण नहीं है, प्रश्न का गिर जाना महत्वपूर्ण है।

– ओशो