ध्यान अक्रिया है – ओशो

रिंझाई नाम का वहां एक साधु हुआ। उसके आश्रम को देखने, जापान का बादशाह एक दफा गया। बड़ा आश्रम था, उसमें कोई पांच सौ भिक्षु थे। वह सा धु एक-एक स्थान को दिखाता हुआ घूमा कि यहां साधु भोजन करते हैं, यहां निवा स करते हैं, यहां अध्ययन करते हैं। सार आश्रम के बीच में एक बहुत बड़ा भवन था। सबसे सुंदर, सबसे शांत, सबसे विशाल। वह राजा बार-बार पूछने लगा, और यहां साधु क्या करते हैं? वह कहने लगा, वहां के विषय में बाद में बात करेंगे। बग चा, लाइब्रेरी, अध्ययनकक्ष, सब बताता है। राजा बार-बार पूछने लगा और यहां स धु क्या करते हैं, यह जो बीच में भवन है? साधु बोला, थोड़ा ठहर जाएं। उसके सं बंध में बाद में बात कर लेंगे। जब पूरा आश्रम घूम कर, राजा वापस होने लगा तब उसने दुबारा पूछा, यह बीच का भवन तो छूट ही गया, यहां साधु क्या करते हैं? आश्रम के प्रधान ने कहा, उसको बताने को, इसलिए मैं रुका कि वहां साधु कुछ करते नहीं। वहां साधु अपने को न करने की स्थिति में छोड़ते हैं। वह ध्यान कक्ष है।

वहां कुछ करते ही नहीं है। बाकी पूरे आश्रम में काम हाता है, केवल वहां काम छो.डा जाता है। बाकी पूरे आश्रम में क्रियाएं होती हैं, वहां क्रियाएं नहीं की जातीं। जब किसी को क्रिया छोड़नी होती है तो वहां चला जाता है, सारी क्रियाएं छोड़ कर चुप हो जाता है। ध्यान अक्रिया है, कोई क्रिया नहीं है कि हम सोचें कि वहां कोई काम है कि हम बै ठे हैं और काम कर रहे हैं। अगर काम कर रहे हैं तो वह ध्यान नहीं है। ध्यान का अर्थ है जो निरंतर काम चल रहा है चित्त में, उसको विराम दे देना। कोई काम न हीं करना है। चित्त को बिलकुल क्रिया शून्य छोड़ देना है। चित्त की क्रिया शून्य स्ाि त में क्या होगा? क्रिया शून्य स्थिति में भीतर कुछ होगा, केवल दर्शन रह जाएगा, केवल देखना रह जाएगा। इस स्थिति में जो हमारा भाव है, वही केवल रह जाएगा।

दर्शन ज्ञान हमारा स्वभाव है। हम सब छोड़ सकते हैं, ध्यान और दर्शन नहीं छोड़ सकते। सतत चौबीस घंटे, ज्ञान हमारे साथ मौजूद है। जब गहरी नींद में सोते हैं, तब भी स्वप्न का हमें पता होता है। जब स्वप्न भी विलीन हो जाते हैं और सुषुप्ति होती है, तब भी हमें इस बात का पता होता है कि बहुत आनंदपूर्ण निद्रा है। सुबह उठकर हम कहते हैं, रात्रि बहुत आनंद से बीत। कोई हमारे भीतर उस समय भी चैतन्य है । उठते-उठते, सोते जागते, काम करते, न काम करते हमारे भीतर एक सतत अविच्छन्न ज्ञान का प्रवाह बना हुआ है। समस्त क्रियाएं छोड़ देने पर केवल ज्ञान का अविच्छिन्न प्रवाह मात्र शेष रह जाएगा। सिर्फ जान रहा हूं, सिर्फ हूं, बोध मात्र होने का, सत्ता का बोध मात्र शेष रह जाएगा। उसी बोध मग, उसी सत्ता मात्र में छलांग लगाना धर्म है। उसी में कूद जाना-उसी अस्तित्व में धर्म है और वहां ज ो अनुभूति होती है वह जीवन के बंधन से जीवन की आसक्ति से, जीवन के दुख से मुक्ति दे देती है, क्योंकि वहां जाकर ज्ञात होता है कि वह जो अंतर्सत्ता भीतर बैठ ी हुई है, वह निरंतर पाप से दुख से, पीड़ा से मुक्त है। एक क्षण को भी उस पर कभी पाप का, पीड़ा का, दुख का कोई दाग नहीं लगता। वह चैतन्य नित्य शांत, ि नत्य मुक्त है। वह चैतन्य नित्य ब्रह्म स्थिति में है। उस चैतन्य में कभी कोई विकार नहीं हुआ, न होने की संभावना है।जैसे ही यह दर्शन होता है, जीवन एक अलौकि क धरातल पर आनंद की अनुभूति के प्रति उन्मुख हो जाता है। इस उन्मुखता को मैं ध्यान और समाधि कहता हूं।

– ओशो