ओशो रजनीश की रहस्यमयी मौत के 27 सालों बाद उठी CBI जांच की मांग

ओशो (Osho) की मौत के पीछे कई तरह के रहस्य हैं. कहा जाता है कि अमेरिका (America) उनसे डरता था और जब वो वहां रहते थे तो उन्हें स्लो पॉइजन दिया जाता था, जो उनकी मौत का कारण बना. ओशो के एक अनुयायी योगेश ठक्कर ने कुछ साल पहले मुंबई हाईकोर्ट में याचिका दायर की. ओशो का निधन 19 जनवरी 1990 को हुआ था. उस दिन के पांच घंटों पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं. पुणे के एक पत्रकार ने भी इस पर एक किताब लिखी… “हू किल्ड ओशो?”

मौत के 27 सालों बाद CBI जांच की मांग
उनकी मौत के पीछे कई तरह के किस्से हैं. कहा जाता है कि अमेरिका उनसे डरता था और जब वो वहां रहते थे तो उन्हें स्लो पॉइजन दिया जाता था, जो उनकी मौत का कारण बना.  ओशो के एक अनुयायी योगेश ठक्कर ने कुछ साल पहले मुंबई हाईकोर्ट में याचिका दायर की. ओशो का निधन 19 जनवरी 1990 को हुआ था. उस दिन के पांच घंटों पर कई सवाल उठाए जा रहे हैं. पुणे के एक पत्रकार अभय वैद्य ने भी इस पर एक किताब लिखी, “हू किल्ड ओशो?” इसमें रजनीश के निधन के दिन की घटनाओं पर तफ्तीश की गई है. योगेश ठक्कर ने उनकी वसीयत को भी बॉम्बे हाई कोर्ट में चैलेंज किया है. उन्होंने कहा था कि ओशो का डेथ सर्टिफिकेट जारी करने वाले डॉक्टर गोकुल गोकाणी लंबे समय तक उनकी मौत के कारणों पर खामोश रहे. बाद में उन्होंने कहा था कि उनसे मृत्यु प्रमाण पत्र पर ग़लत जानकारी देकर साइन करवाए थे.

डॉक्टर गोकुल गोकाणी ने भी योगेश ठक्कर के केस में अपनी तरफ से शपथपत्र दाखिल किया और कहा कि ओशो की मौत के कारणों को लेकर कई रहस्य हैं. कहा गया कि ओशो के निधन से पहले के पांच घंटे रहस्य और साजिश से भरे हुए थे. न तो उनके डॉक्टर को पास आने दिया गया था और ना उनकी मां से मुलाकात कराई गई थी. रजनीश के निधन के करीब 27 सालों बाद उनके अनुयायियों ने ये मांग उठाई कि उनके निधन की सीबीआई जांच कराई जाए.

‘सेक्स गुरु’ कहते थे लोग
ओशो अपने क्रांतिकारी विचारों से हमेशा विवादों में रहे. उस दौरान ओशो के विचारों से प्रभावित होकर लोग सब कुछ त्याग कर उनके पीछे चले आते थे. इस लिस्ट में उस दौर के कई सुपर स्टार भी शामिल थे. भक्त उन्हें भगवान ओशो कहकर बुलाते थे. इससे उलट कुछ लोग ओशो एक ‘सेक्स गुरु’ कहते थे. ओशो ने लोगों को जो मोक्ष का नया रास्ता बताया, ऐसे स्वतंत्र विचार सभी के लिए खतरा बन चुके थे. साल 1981 से 1985 के बीच ओशो अमरीका में थे. अमरीकी प्रांत ओरेगॉन में उन्होंने आश्रम बनाया. वो समय भी बेहद विवादास्पद रहा. महंगी घड़ियां, रोल्स रॉयस जैसी कारें और डिजाइनर कपड़ों की वजह से वो चर्चा में रहे. वहां भी एक तरफ ओशो के शिष्य और भक्त थे तो दूसरी तरफ स्थानीय लोग जो उनका विरोध करते थे.

21 देशों ने किया बैन
किताब ‘कौन है ओशो: दार्शनिक, विचारक या महाचेतना’ में लेखक शशिकांत सदैव ने लिखा कि फरवरी 1986 में ओशो ने विश्व भ्रमण की शुरुआत की लेकिन अमेरिकी सरकार के दबाव की वजह से 21 देशों ने या तो उन्हें देश से निष्कासित किया या फिर देश में प्रवेश की अनुमति नहीं दी. इन देशों में ग्रीस, इटली, स्विटजरलैंड, स्वीडन, ग्रेट ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, कनाडा और स्पेन प्रमुख थे.

अमेरिका भी डरने लगा था Osho से
उनकी शिष्या रहीं ब्रिटिश मनोवैज्ञानिक गैरेट ने एक इंटरव्यू में बीबीसी को बताया था, “हम एक सपने में जी रहे थे. हंसी, आजादी, स्वार्थहीनता, सेक्सुअल आजादी, प्रेम और दूसरी तमाम चीजें यहां मौजूद थीं. “शिष्यों से कहा जाता था कि वे यहां सिर्फ अपने मन का करें. वे हर तरह की वर्जना को त्याग दें, वो जो चाहें करें. गैरेट कहती हैं, “हम एक साथ समूह बना कर बैठते थे, बात करते थे, ठहाके लगाते थे, कई बार नग्न रहते थे. हम यहां वो सब कुछ करते थे जो सामान्य समाज में नहीं किया जाता है.” कहा जाने लगा कि क्रांतिकारी विचार से अमेरिका भी डरने लगा था और वहां उन्हें स्लो पॉइजन दिया जाता था, जो बाद में उनकी मौत का कारण बना. धीरे-धीरे ओशो रजनीश के फॉलोवर्स की संख्या इतनी बढ़ने लगी कि ऑरेगन सरकार के लिए भी खतरा बन गई.

थैलियम नामक जहर दिया?
1985 में अमेरिकी सरकार ने ओशो पर अप्रवास नियमों के उल्लंघन के तहत करीब 35 आरोप लगाए और उन्हें हिरासत में ले लिया. बाद में उन्हें पेनाल्टी भरकर और देश छोड़ने और 5 साल तक वापस ना आने की सजा के साथ छोड़ा. कुछ रिपोर्ट्स में ये दावा किया गया कि इसी दौरान उन्हें जेल में अधिकारियों ने थैलियम नामक जहर दिया जाता था. 14 नवंबर 1985 को वो अमेरिका छोड़कर भारत लौट आए. इसके बाद नेपाल चले गए. भारत वापस आने के बाद 19 जनवरी, 1990 में ओशो की हार्ट अटैक आने से मौत हो गई. कहा जाता है कि अमेरिकी जेल में दिए जा रहे थैलिसियम के इंजेक्शन उनकी मौत की वजह थी. वहां उन्हें रेडियोधर्मी तरंगों से लैस चटाई पर सुलाया जाता था. इस बात का अभी तक कोई ठोस सबूत नहीं है, लेकिन ओशो के अनुयायी तत्कालीन अमेरिकी सरकार को ही उनकी मृत्यु का कारण मानते हैं.

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